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Karnal News: तीर्थ व नदी ही नहीं वनों की नगरी भी रही धर्मनगरी, सात वनाें का रहा 48 कोस कुरुक्षेत्र

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कुरुक्षेत्र। गांव बीड़ पिपली ​स्थित रंतुक्ष यक्ष तीर्थ चिट्टा मंदिर। संवाद
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कुरुक्षेत्र। धर्मनगरी कुरुक्षेत्र तीर्थों व नदियों की ही धरा नहीं रही बल्कि यह सात वनों से भी आच्छादित रही है। भले ही प्राचीन कुरुक्षेत्र के इन सात वनों में से कुछ समय के साथ खत्म हो गए और कुछ के नाम बदल गए लेकिन कुरुक्षेत्र की महिमा सामने आते ही इन प्राचीन वनों का जिक्र हर किसी के कंठ पर आ जाता है। कई वनों के नाम से जुड़े संबंधित गांवों के नाम आज भी लिए जाते हैं और इन वनों के चलते ही अनेक गांव व 48 कोस कुरुक्षेत्र की भूमि की बड़ी पहचान भी रहे। अब इन वनों के स्थान पर संबंधित तीर्थों के आसपास उपवन बनाए जाने की चर्चा भी प्रबल होने लगी है।
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कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के मुताबिक कुरुक्षेत्र, कैथल, करनाल, जींद व पानीपत की 48 कोस भूमि स्थित सात वनों में ही प्राचीन ऋषि मुनियों के आश्रम थे। कई ऋषि मुनियों ने अनेक ग्रंथों की रचना भी यहीं पर की। सात वन के इस कुरुक्षेत्र के चारों ओर चार यक्ष बेहरजख, कैथल में अरंतुक यक्ष, बीड़ पीपली में रंतुक यक्ष, पोकरी खेड़ी जींद में कपिल यक्ष व सींक पानीपत में मचक्रुक यक्ष थे। माना जाता है कि अनादि काल से ही भारतीय उपमहाद्वीप में रक्षक देवों के रूप में यक्षों की उपसना की जाती थी।
ये रहे प्राचीन समय में कुरुक्षेत्र 48 कोस के वन

आदिति वन - अभिमन्युपुर जिला कुरुक्षेत्र काम्यक वन - कमौदा जिला कुरुक्षेत्र
शीत वन - सीवन जिला कैथल फलकी वन - फरल जिला कैथल
सूर्य वन - सजूमा जिला कैथल
मधुबन - मोहना जिला कैथल
ब्यास वन - बस्तली जिला करनाल
उपवन विकसित किए जाने पर काम करने की जरूरत
श्रीकृष्ण संग्रहालय प्रभारी बलवान सिंह का कहना है कि प्राचीन वन खत्म हो चुके हैं लेकिन उस वन संस्कृति को जीवंत करने के लिए संबंधित जगहों व तीर्थ स्थलों के आसपास उपवन विकसित किए जा सकते हैं। इससे कुरुक्षेत्र 48 कोस को नया व खास स्वरूप मिल पाएगा।
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पौराणिक साहित्यों में है कुरुक्षेत्र का वर्णन : रोशा
कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के सदस्य अशोक रोशा का कहना है कि कुरुक्षेत्र की महिमा व्यापक है और इसके तीर्थों व क्षेत्र का वर्णन पौराणिक साहित्यों में दर्ज है। कुरुक्षेत्र 48 कोस की यह भूमि सात वनों से घिरी हुई थी। कुरुक्षेत्र 48 कोस की परिक्रमा बीड़ पिपली रंतुक यक्ष से ही शुरू की जाती है। इस तीर्थ का जीर्णोद्धार भी किया जा चुका है।
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