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पॉक्सो एक्ट में केवल आरोप के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता : न्यायाधीश

Sat, 27 Dec 2025 01:33 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
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करनाल। पॉक्सो की स्पेशल फास्ट ट्रैक अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश गुनीत अरोड़ा ने घरौंडा थाना में 2020 में दर्ज हुए दुष्कर्म के मामले में चार साल बाद आरोपी को बरी किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उन्हें ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित न किया जाए। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और रिकॉर्ड में मौजूद तथ्यों का बारीकी से अवलोकन करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। मामले की सुनवाई के दौरान कई अहम विरोधाभास सामने आए, जिनका लाभ आरोपी को मिला और अंततः कोर्ट ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया।
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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश गुनीत अरोड़ा की अदालत ने राज्य बनाम विजय मामले में यह निर्णय सुनाया है। 2020 में घरौंडा थाना में दर्ज हुए इस मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से आरोपी विजय पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। अदालत ने सभी पहलुओं पर विचार करते हुए स्पष्ट किया कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उन्हें ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित न किया जाए।

इस मामले में आरोपी विजय को करीब चार साल तक न्यायिक हिरासत में रहना पड़ा। मामला नाबालिग लड़की से जुड़ा होने और संवेदनशील होने के कारण लंबे समय तक आरोपी को जमानत नहीं मिल सकी। आरोपी पक्ष के अधिवक्ता का कहना है कि वो शुरुआत से ही निर्दोष थे, लेकिन पीड़ित लड़की के परिजनों की ओर से दर्ज कराई शिकायत के चलते उन्हें लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। वहीं अधिवक्ता ने बताया कि पहले जिला सेशन कोर्ट से जमानत याचिका खारिज हो चुकी थी। इसके बाद पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में जमानत याचिका दायर की गई। जहां से विजय को जमानत मिली। जमानत के बाद विशेष पॉक्सो अदालत में बचाव पक्ष की ओर से प्रभावी पैरवी की गई।
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विरोधाभाषी बयानों पर बचाव पक्षा ने रखा मजबूती से पक्ष
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अभियोजन गवाहों की गहन जिरह की। अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में मौजूद विरोधाभासों और कानूनी कमियों को बचाव पक्ष ने अदालत के समक्ष मजबूती से रखा। अदालत ने इन बिंदुओं को गंभीरता से सुना और रिकॉर्ड पर लिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में असफल रहा है। इसी आधार पर आरोपी विजय को सम्मानपूर्वक बरी कर दिया गया। हालांकि अदालत ने यह भी माना कि आरोपी को मामले में लंबा समय जेल में बिताना पड़ा।
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