संवाद न्यूज एजेंसी
नीलोखेड़ी। विस्तार शिक्षा संस्थान नीलोखेड़ी में शुक्रवार को प्राकृतिक खेती के लिए विस्तार विधियों पर आधारित प्रशिक्षण दिया गया। जिसके समापन पर संस्थान के क्षेत्रीय निदेशक डा. संजय कुमार ने कहा कि केमिकल फॉर्मिंग से जमीन की उर्वरा क्षमता कम होती जा रही है। प्राकृतिक खेती इस समस्या के समाधान के रूप में उभरी है।
प्रशिक्षण समारोह के अंतिम दिन क्षेत्रीय निदेशक ने कहा कि प्राकृतिक खेती के चार स्तंभ जीवमृत, बीजामृत, वाफसा एवं मल्चिंग हैं। यह संस्थान उत्तर भारत के राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के कृषि, उद्यान, पशु-पालन, मत्स्य पालन, वानिकी, महिला एवं बाल विकास इत्यादि विभागों के विस्तार अधिकारियों को प्रशिक्षण देने का काम कर रहा है। विस्तार अधिकारियों को राजकीय प्रशिक्षण संस्थान, प्राकृतिक खेती, कुरुक्षेत्र का भ्रमण करवाया गया।
वह पद्मश्री डा. हरिओम ने प्रतिभागियों को प्राकृतिक खेती के प्रभाव व क्षमता के बारे में विस्तार से बताया। कार्यक्रम संयोजक डा. भरत सिंह घनघस ने कहा कि मनुष्य व पशुओं का स्वास्थ्य सीधे हमारी भूमि के स्वास्थ्य के साथ जुड़ा है। भूमि स्वस्थ है तो ही हम व हमारे पशु स्वस्थ रह सकते हैं। डा. भरत सिंह ने विस्तार कृषि अधिकारियों को किसानों के उत्पादन की बिक्री में मदद करने का आह्वान किया।
उन्होंने किसानों को समूह बनाकर उनके उत्पादों की बिक्री की सलाह दी। प्राकृतिक उत्पादों की मांग दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। प्रशिक्षण संयोजक डा. भरत सिंह ने बताया कि प्रशिक्षण में हरियाणा, पंजाब, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर एवं उत्तर प्रदेश के विस्तार अधिकारियों ने हिस्सा लिया है। अंत प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र वितरित किए गए।