लोकसभा चुनाव के बीच हॉट सीट करनाल में विधानसभा के उपचुनाव का भी शोर है। दोनों चुनाव एक साथ हैं। लोकसभा चुनाव में जहां पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल मैदान में हैं, वहीं मौजूदा सीएम नायब सैनी करनाल विधानसभा का उपचुनाव लड़ रहे हैं। लोकसभा चुनाव लड़ने के चलते पूर्व सीएम मनोहर लाल ने ही यह सीट छोड़ी है।
पंजाबी बाहुल्य इस सीट पर मनोहर दो बार करनाल विधानसभा से विधायक रहते हुए बतौर मुख्यमंत्री सूबे की कमान संभाल चुके हैं। सीएम नायब सैनी यहां से जीते तो वे पूर्व सीएम मनोहर की सियासी विरासत को आगे बढ़ाएंगे। भाजपाइयों ने भी इसी बात का शोर मचा रखा है। विधानसभा उपचुनाव की सियासी पिच पर भले ही नायब सैनी मजबूती से बल्लेबाजी करते दिख रहे हैं मगर उन्हें सहारा नरेंद्र मोदी (नमो) और मनोहर लाल (मनो) सरकार के कामों का ही है, क्योंकि उनके पास यहां के मतदाताओं को दिखाने के लिए अपना कोई काम नहीं है।
सीएम बनने से पहले नायब कुरुक्षेत्र लोकसभा सीट (2019-24) से सांसद थे। इससे पूर्व वे मनोहर लाल सरकार पार्ट-1 में राज्य खनन मंत्री थे। करनाल क्षेत्र उनके लिए पूरी तरह नया इलाका है। इसलिए मतदाताओं से रूबरू होते हुए वे नरेंद्र मोदी और मनोहर लाल के कार्यों का ही सबसे ज्यादा बखान करते हैं। अपने संबोधनों में वे दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा, राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन की सोच पर ज्यादा हमलावर दिखते हैं।
हरियाणा के सीएम नायब सैनी
- फोटो : twitter @NayabSainiBJP
लोकसभा चुनाव के बीच हॉट सीट करनाल में विधानसभा के उपचुनाव का भी शोर है। दोनों चुनाव एक साथ हैं। लोकसभा चुनाव में जहां पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल मैदान में हैं, वहीं मौजूदा सीएम नायब सैनी करनाल विधानसभा का उपचुनाव लड़ रहे हैं। लोकसभा चुनाव लड़ने के चलते पूर्व सीएम मनोहर लाल ने ही यह सीट छोड़ी है।
पंजाबी बाहुल्य इस सीट पर मनोहर दो बार करनाल विधानसभा से विधायक रहते हुए बतौर मुख्यमंत्री सूबे की कमान संभाल चुके हैं। सीएम नायब सैनी यहां से जीते तो वे पूर्व सीएम मनोहर की सियासी विरासत को आगे बढ़ाएंगे। भाजपाइयों ने भी इसी बात का शोर मचा रखा है। विधानसभा उपचुनाव की सियासी पिच पर भले ही नायब सैनी मजबूती से बल्लेबाजी करते दिख रहे हैं मगर उन्हें सहारा नरेंद्र मोदी (नमो) और मनोहर लाल (मनो) सरकार के कामों का ही है, क्योंकि उनके पास यहां के मतदाताओं को दिखाने के लिए अपना कोई काम नहीं है।
सीएम बनने से पहले नायब कुरुक्षेत्र लोकसभा सीट (2019-24) से सांसद थे। इससे पूर्व वे मनोहर लाल सरकार पार्ट-1 में राज्य खनन मंत्री थे। करनाल क्षेत्र उनके लिए पूरी तरह नया इलाका है। इसलिए मतदाताओं से रूबरू होते हुए वे नरेंद्र मोदी और मनोहर लाल के कार्यों का ही सबसे ज्यादा बखान करते हैं। अपने संबोधनों में वे दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा, राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन की सोच पर ज्यादा हमलावर दिखते हैं।
नायब प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में रेल, रोड और एयर कनेक्टिविटी, अनुच्छेद 370 और तीन तलाक के खात्मे, सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट (सीएए), उज्ज्वला और मुद्रा लोन योजना, गरीबों के लिए मकान और शौचालय बनवाना, किसानों को फसलों के अच्छे भाव दिलवाना, ई-मंडियों की व्यवस्था, देश में नए मेडिकल कॉलेजों और एम्स की बढ़ती संख्या समेत मोदी की गारंटी संबंधी मुद्दाें को मतदाताओं के समक्ष प्रभावशाली ढंग से उछालते हैं।
वहीं, मनोहर सरकार में किसानों के लिए भावांतर भरपाई योजना, बिना खर्ची-पर्ची के नौकरी और करनाल के विकास इत्यादि बातों को भी भुनाने का प्रयास अपनी जनसभाओं में करते हैं। उनके समर्थक भी इस बात का शोर सबसे ज्यादा मचा रहे हैं कि 10 साल से करनाल सीएम सिटी था और यदि नायब जीतते हैं, तो शहर के लिए यह दर्जा कायम रहेगा, जिसका फायदा यहां विकास के रूप में दिखेगा।
स्थानीय मुद्दों पर भाजपा की घेराबंदी
उधर, सीएम के समक्ष मुकाबले में कांग्रेस ही दिखती है जबकि नौ प्रत्याशी उपचुनाव में ताल ठोके हुए हैं। कांग्रेस ने तरलोचन सिंह को मुकाबले में उतारा है। वे 2019 के विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल के समक्ष भी चुनाव लड़ चुके हैं। तरलोचन ने भी डोर-टू-डोर अभियान और नुक्कड़ सभाओं को मतदाताओं तक पहुंचाने और उन तक अपनी बात रखने का जरिया बना रखा है। अपनी सभाओं में कांग्रेस प्रत्याशी करनाल को स्मार्ट सिटी बनाने के नाम पर अधूरी परियोजनाओं, शहर की टूटी सड़कों, ठप सीवरेज, जलभराव की समस्या, बाढ़ के पानी से मार, बढ़ता क्राइम, स्लम क्षेत्रों की अनदेखी समेत अन्य स्थानीय मुद्दों पर भाजपा की घेराबंदी करते दिखते हैं।
पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के 10 साल के कार्यकाल में सीएम सिटी रोहतक और मनोहर लाल के कार्यकाल में सीएम सिटी करनाल में हुए विकास कार्यों की तुलना भी वे मतदाताओं के सामने करते नहीं थकते। इस चुनाव में तरलोचन को आम आदमी पार्टी का भी सहयोग मिल रहा है। आप ने यहां से कोई प्रत्याशी नहीं उतारा है। इनेलो और बसपा पहले ही रण से बाहर है।
ये महारथी हैं चुनावी रण में
करनाल विधानसभा के उपचुनाव में भाजपा की ओर से सीएम नायब सैनी मैदान में हैं। कांग्रेस से तरलोचन सिंह, जननायक जनता पार्टी से राजेंद्र, राष्ट्रीय गरीब दल से तिलक राज सिंगला, राष्ट्रीय मजदूर एकता पार्टी से रोहताश, पीपल्स पार्टी ऑफ इंडिया (डेमोक्रेटिक) से सुरेश कुमार प्रत्याशी हैं। इनके अलावा राजेंद्र कुमार दादूपुर, श्मशेर सिंह नैन व इंजीनियर सुरेश कुमार भी बतौर आजाद प्रत्याशी इस उपचुनाव में किस्मत आजमा रहे हैं।
भाजपा का गढ़ रही है यह सीट
करनाल विधानसभा शुरू से ही भाजपा का गढ़ रही है। इस सीट पर अब तक 13 विधानसभा चुनावों में से 4 बार भाजपा, 2 बार भारतीय जन संघ, 1 बार जनता पार्टी का विधायक जीता है। यहां से 4 बार कांग्रेस और 2 बार निर्दलीय विधायक भी चुने गए। वर्ष 2014 से इस सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार है और अब भाजपा हैट्रिक की फिराक में है। वर्ष 1967 में हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ के रामलाल इस सीट से पहले विधायक बने थे। 1972 व 1977 में वे फिर विधायक चुने गए।
इसी बीच वर्ष 1968 में आजाद प्रत्याशी शांति प्रसाद, 1982 में पहली बार कांग्रेस प्रत्याशी शांति देवी, 1987 में भाजपा के लक्ष्मण दास, 1991 में कांग्रेस के जयप्रकाश, 1996 में भाजपा के शशिपाल मेहता, 2000 में आजाद प्रत्याशी जयप्रकाश चुनाव जीते। इसके बाद वर्ष 2005 व 2009 में कांग्रेस की सुमिता सिंह और वर्ष 2014 व 2019 में भाजपा के मनोहर लाल लगातार दो बार विधायक बने। जीतने के बार मनोहर सीएम बने और 2014 में पहली बार करनाल को सीएम सिटी का दर्जा मिला।
वर्ष 1972 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ के रामलाल और कांग्रेस की शांति देवी में कड़ी टक्कर थी। रामलाल यह चुनाव महज 862 वोटों से जीते थे। इस सीट पर यह सबसे कम वोट से जीत का अंतर था। सबसे ज्यादा वोट से जीत के अंतर का रिकॉर्ड यहां पूर्व सीएम मनोहर लाल के नाम है। उन्होंने 2014 में अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी आजाद प्रत्याशी जयप्रकाश को 63773 मतों से हराया था। इस बार करनाल विधानसभा में करीब 2 लाख 56 हजार 267 मतदाता हैं।
पिछले पांच चुनावों में स्थिति
वर्ष दल विधायक वोट प्रतिशत दूसरे स्थान पर
2000 आजाद जयप्रकाश 37.41 सतीश कालड़ा (भाजपा)
2005 कांग्रेस सुमिता सिंह 53.01 जय प्रकाश (आजाद)
2009 कांग्रेस सुमिता सिंह 35.43 जयप्रकाश (हजकां)
2014 भाजपा मनोहर लाल 58.75 जयप्रकाश (आजाद)
2019 भाजपा मनोहर लाल 63.72 तरलोचन सिंह (कांग्रेस)
मतदाता मुद्दों में उलझे दिख रहे
इस वक्त इस सीट पर मतदाता दो चुनावों यानी लोकसभा और विधानसभा उपचुनाव के मुद्दों के बीच उलझ रहे हैं। भाजपा के दोनों प्रत्याशी जनता के समक्ष केंद्र और राज्य सरकार की उपलब्धियों से जुड़े मुद्दों को उछाल रहे हैं, तो वहीं कांग्रेसी प्रत्याशी सरकारी नीतियों को कोसते हुए करनाल की स्थानीय समस्याओं पर फोकस किए हुए हैं।
हरियाणा फार्मा मैन्युफेक्चरर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष व एचएसआईआईडीसी इंडस्ट्रीज वेलफेयर एसोसिएशन के चेयरमैन आरएल शर्मा बताते हैं कि इस समय जनता विकास के लिए सीएम सिटी के दर्जे को बरकरार रखने और मनोहर के जरिये केंद्र तक अपनी पहुंच बनाने की बात भी सोच रही है मगर इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अभी करनाल में अपेक्षाकृत औद्योगिक विकास की बहुत जरूरत है।
खेल प्रशिक्षक नरेंद्र कुकरेजा कहते हैं कि खिलाड़ियों के लिए प्रोत्साहन की बहुत कमी दिखती है। सरकारी नर्सरियों में कई-कई महीने खिलाड़ियों की डाइट मनी ही नहीं आती। जब खिलाड़ी कॅरिअर बनाने के लिए संघर्ष कर रहा होता है, तो उस समय उसे उचित प्रोत्साहन नहीं मिलता और खिलाड़ी कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करता है, तो सरकार उस पर इनामों की बौछार कर देती है। भले ही वे खिलाड़ी किसी प्राइवेट अकादमी से निकलकर क्यों न आया हो। इस स्थिति पर सरकार को सोचना होगा। शुरुआती दौर में ही खिलाड़ियों के लिए बेहतर सुविधाएं और प्रशिक्षक उपलब्ध कराने होंगे।
डॉ. रामजी लाल के अनुसार इस चुनाव में सीएम और पूर्व सीएम दोनों मैदान में हैं। मुद्दे भी अलग-अलग हैं। इसलिए मतदाता थोड़ा कंफ्यूज दिख रहा है। सरपंच और किसान भाजपा का विरोध कर रहे हैं। कांग्रेसी भी पूरी तरह हमलावर है। इसलिए भाजपा के लिए चुनौती कम नहीं है। जिला करनाल ब्राह्मण सभा के अध्यक्ष सुरेंद्र बड़ौता बताते हैं कि मनोहर सरकार के कार्यकाल में यहां विकास तो हुआ है लेकिन और बेहतर की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। उनके अनुसार सरकार की कई उल्लेखनीय उपलब्धियां भी हैं। पहले और अबके करनाल में फर्क तो दिखता है।
कारोबारी गुरमीत सिंह और जोगिंद्र कहते हैं कि आज भी करनाल की कई मुख्य सड़कें टूटी पड़ी हैं। बाहरी कॉलोनियों में विकास नहीं हुआ है। सीवरेज सिस्टम बेहतर नहीं है। जिस वजह से थोड़ी देर की बारिश में ही जलभराव हो जाता है। कर्मचारी भी कुछ नीतियों को लेकर सरकार से नाराज दिखते हैं। ऐसे में वे सोच समझकर ही वोट करेंगे।