मिड-डे मील के मामले में भारतीय खाद्य निगम और खाद्य आपूर्ति विभाग के अधिकारियों की लापरवाही का बड़ा मामला सामने आया है। एफसीआई ने असंध से गेहूं से भरे दो ट्रक राजस्थान के कोटपुतली शहर में मिड-डे मील के लिए भेजे थे।
वहां पर जयपुर लैब में जब उनके सैंपल लिए गए तो गेहूं में कीडे़ और फंगस की पुष्टि हो गई। इसके बाद राजस्थान से यह गेहूं लौटा दिया है। असंध ट्रक यूनियन के लेखाकार राजकुमार, आजाद, रमेशचंद, अजमेर, संदीप सहित अन्य ने बताया कि एफसीआई ने रतक मार्ग पर स्थित एक राइस मिल में खाद्य एवं आपूर्ति विभाग द्वारा स्टोर की गई सन 2011-12 वर्ष की गेहूं के दो ट्रक राजस्थान के कोटपुतली भेजे थे।
वहां जब अधिकारियों ने कट्टों से त्रिपाल हटाई तो उसमें कीड़े और फंगस की मात्रा थी। वहां के अधिकारियों ने इसकी सूचना जयपुर लैब में भेजी। इसके बाद गेहूं से सैंपल भरकर उनका परीक्षण किया गया तो गेहूं को यह कहकर पूर्ण रूप से रिजेक्ट कर दिया गया कि भेजी गई गेहूं किसी भी लिहाज से इंसानों के खाने लायक नहीं है।
इसमें जीवित कीटाणु ,फंगस, बरसात के प्रभाव से पैदा हुई खामियां व खराब रखरखाव से उत्पन्न समस्याएं मौजूद हैं। इसके बाद यह गेहूं राजस्थान सरकार ने वापस भेज दिया है। हैरानी की बात यह है कि यदि गेहूं इतना खराब था तो इसे मासूम बच्चों व गरीबों की जान से खिलवाड़ करने के लिए क्यों भेजा गया?
क्या अधिकारी गेहूं भंडारण में हुई लापरवाही को छिपाने व अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए ही लोगों की जिंदगियों का जोखिम ले लिया। इस मामले में जब मीडिया ने खाद्य आपूर्ति विभाग की रखी गई गेहूं को देखा तो खुले आसमान के नीचे पड़े गेहूं के चट्टों में पूरी तरह से बदबू पैदा हो चुकी थी। गेहूं के हालात इस कद्र खराब हो चुके थे कि कोई पशु भी खाए तो बीमार हो जाए।
ऐसे में अधिकारियों की भंडारण वे डिस्पेच में बरती गई लापरवाही किसी भी अप्रिय घटना का कारण बन सकती है। वहीं, दूसरी ओर ट्रक ड्राइवरों ने भी एफसीआई के खिलाफ जमकर नारेबाजी करते हुए आरोप लगाया कि गेहूं वापस आए आठ दिन हो गए हैं, परंतु विभाग के अधिकारी उनके ट्रकों को खाली नहीं कर रहे हैं।
जनाब ने कोटपुतली प्रशासन को ही घेरा
खराब गेहूं पर एफसीआई के अधिकारी कुछ बोले नहीं, बल्कि इस मामले में राजस्थान सरकार पर ही दोष मढ़ दिया। एफसीआई के टी थ्री अधिकारी अनिल ने बताया कि कोटपुतली प्रशासन की यह कार्रवाई नियमों के विरुद्ध है। गेहूं चाहे जैसा भी था, कोटपुतली प्रशासन उसे वापस नहीं भेज सकता था।