- इंटरनेशन फर्टिलाइजर डेवलेपमेंट सेंटर यूएस से हुआ एमएचयू करनाल का करार
- समन्वित पौधपोषण प्रबंधन पर करेंगे काम, उर्वरक के सही तरीके, सही समय पर होगा शोध
देव शर्मा
करनाल। पर्यावरण हो या फिर मिट्टी का स्वास्थ्य, उर्वरक इसमें बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। कहीं किसान आवश्यकता से अधिक खाद लगा रहे हैं तो पोषक तत्वों को नजरअंदाज कर रहे हैं। इसी पर खास शोध कर एक निश्चित और सर्वमान्य मात्रा व समय निर्धारित करने की दिशा में करनाल के महाराणा प्रताप उद्यान विश्वविद्यालय और अमेरिका के इंटरनेशन फर्टिलाइजर डेवलेपमेंट सेंटर के बीच करार (एमओयू) हुआ है।
बढ़ता पर्यावरण और मिट्टी की लगातार खराब हो रही स्थिति सिर्फ भारत की ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसके पीछे यूं तो कई मुख्य कारण हैं लेकिन इसमें एक मुख्य कारण उर्वरक भी है। उर्वरक जब खेत में लगाई जाती है तो वह जल की भाप के साथ उड़कर वायु मंडल में जाती है तो पानी के साथ जमीन के अंदर भी जाती है, जिसका प्रभाव पर्यावरण और खेती की उर्वराशक्ति पर भी सीधे तौर पर देखा जाता है। किसानों में जागरूकता की कमी होने के कारण आज भी किसान मिट्टी की जांच कम ही कराते हैं, उन्हें पता नही होता कि उनके खेत को किस खाद की किस समय कितनी आवश्यकता है। बिना जानकारी के ही वह खाद भी लगा देते हैं, जिसकी आवश्यकता खेत को नहीं होती। जिसका दुष्प्रभाव फसल पर भी पड़ता है।
महाराणा प्रताप उद्यान विश्वविद्यालय (एमएचयू) के कुलपति डॉ. सुरेश मल्होत्रा ने बताया कि यूएस का इंटरनेशन फर्टिलाइजर डेवलेपमेंट सेंटर कई देशों के साथ मिलकर उर्वरक की मात्रा, समय आदि पर अध्ययन कर रहा है। अब इसके साथ एमएचयू करनाल का भी एमओयू हो गया है, इसलिए अब इस दिशा में एमएचयू के वैज्ञानिक और तकनीकि अधिकारी भारत की जलवायु, वातावरण, जल और मिट्टी की स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस दिशा में शोध करेंगे। जिसका सीधा फायदा आने वाले दिनों में किसानों को मिलेगा और मिट्टी और पर्यावरण को भी सुरक्षित रखने में सहयोग मिलेगा।
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- एमएचयू करनाल के कुलपति डॉ. सुरेश मल्होत्रा बताते हैं कि भूमि का स्वास्थ्य बनाए रखना भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए चुनौती बनता जा रहा है। हम सतत खेत के सिद्धांत पर आगे बढ़कर समन्वित पौधपोषण प्रबंधन की दिशा में काम कर रहे हैं। इस एमओयू का लक्ष्य भी यही है।