जिले में देसी और अंग्रेजी शराब के ठेकों से प्रदेश सरकार को जबरदस्त झटका लगा है। साल में ही करीब 21 करोड़ 15 लाख 96 हजार रुपये का नुकसान हो गया है।
जिले के सात प्वाइंटों पर ठेके नहीं खुल पाए हैं। इन ठेकों पर विभाग के अधिकारियों को ठेकेदारों का बेसब्री से इंतजार है। शराब ठेकों के रेट डाउन जाने के कई कारण हैं।
अफसर तर्क देते हैं कि सामाजिक संस्थाओं द्वारा ठेकों को बंद कराने की मुहिम से इस बार शराब के कई ठेके आधे रेट में गए हैं। लोगों का कहना है कि आबकारी एवं कराधान विभाग के अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से शराब ठेकों के रेट कम रहे हैं।
हाईकोर्ट के निर्णय के मुताबिक सड़क से ठेके की लोकेशन खत्म करके सड़क से दूर करनी थी। अफसरों ने कागजों में यह दूरी भी कर दी। इस स्थिति में सेल कम होने का कारण दिखाकर शराब ठेकों के रेट घट गए।
जबकि अब भी शराब ठेके सड़क पर ही चल रहे हैं। अगर सरकार पूरे मामले की जांच पड़ताल कराए तो ठेकेदारों और अफसरों में गोलमाल सामने आ सकता है।
जिले के आधे दर्जन से अधिक ठेके पिछले साल के मुकाबले अब 50 प्रतिशत घाटे में गए हैं। जिले में 117 देसी शराब और 59 ठेके अंग्रेजी शराब के हैं।
वर्ष 2013-14 के अलॉट किए देशी ठेकों से 98 करोड़ आठ लाख 94 हजार रुपये में वार्षिक दिए थे। अंग्रेजी शराब के ठेके 52 करोड़ 39 लाख 75 हजार रुपये में अलॉट किए थे।
अब वर्ष 2014-15 के लिए किए अलॉट में देसी और अंग्रेजी दोनों ठेकों में राजस्व गिर गया है। अब 59 अंग्रेजी ठेके 40 करोड़ 12 लाख 33 हजार रुपये और 117 देसी शराब के ठेके 89 करोड़ 20 लाख चार हजार रुपये में अलॉट किए हैं।
पिछले साल के मुकाबले इस साल में दिए ठेकों से आबकारी एवं काराधान विभाग को लगभग 21 करोड़ 15 लाख 96 हजार रुपये का घाटा हुआ है।विभाग को नुकसान पहुंचाने में अफसरों और ठेकेदारों की कार्यप्रणाली पर संदेह तय है।
सात अंग्रेजी शराब के ठेकों की जगह खाली
आबकारी एवं काराधान विभाग के अधिकारियों ने बताया कि अंग्रेजी शराब के सात ठेकों की जगह खाली है। सूचना दे चुके हैं, लेकिन ठेकेदार नहीं आ रहे हैं।
जीटी रोड घरौंडा, कैमला मोड़ घरौंडा, कोहंड-एक नंबर, कोहंड-दो नंबर, दिल्ली बाईपास करनाल, गांव झंझाड़ी, हांसी चौक करनाल में अंग्रेजी शराब ठेके अलॉट किए जाने हैं।
घटाने चाहिए शराब के रेट
लोगाें का कहना है कि शराब के ठेके पहले से बहुत ज्यादा कम में अलॉट हुए हैं। ऐसे में शराब के रेट में भी कमी आनी चाहिए।
जब ठेके महंगे रेट में गए थे उस समय भी वहीं रेट, अब सस्ते में भी वहीं रेट गलत है। यह तो ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने वाला खेल तो नहीं खेला जा रहा है।