जिला स्वास्थ्य विभाग के हाल बेहाल हैं और यहां दवाएं मरीजों को ‘दर्द’ दे
रही हैं। पहले दवा को लिखवाने के लिए मरीज को घंटों कड़ी मशक्कत करनी पड़ती
है। दवा लिखवाकर दवा खिड़की तक मरीज पहुंचता है तो उसे पता चलता है कि
यहां यह दवा मौजूद ही नहीं है। हालांकि जिला सिविल अस्पताल में मुख्यमंत्री
मुफ्त इलाज के तहत 427 तरह की दवाएं 427 और कंपोनेंट मुफ्त देने की योजना
बनाई है, लेकिन मरीजों को इन 427 दवाओं में से 127 दवाएं भी पूरी तरह से
अस्पताल पहुंचने पर नहीं मिल पाती। न सीएचसी में न ही पीएचसी में ज्यादातर
दवाएं उपलब्ध हैं और न ही जिला अस्पताल में। हिदायतों के बावजूद अस्पतालों
में उपलब्ध दवाओं की लिस्ट न जिला सिविल अस्पताल में कहीं भी लगाई गई है न
ही किसी सीएचसी या पीएचसी में दवाओं की कोई सूची किसी बोर्ड या दीवार पर
अंकित की गई है। हाल यह है कि कफ (खांसी) से लेकर कब्ज निवारक सिरप तक
मरीजों को बाहर से खरीदने पड़ रही हैं। इसी तरह एसिड निवारक सिरप भी
अस्पताल में अकसर नहीं मिलती। फार्मासिस्ट डॉक्टर द्वारा लिखी दवा को एनए
लिखकर मरीज को बाहर से दवा लेने के लिए भेज देते हैं। नियमानुसार डाक्टर
सरकारी पर्ची पर एक भी बाहर की दवा नहीं लिख सकता, लेकिन यहां आने वाले
मरीजों को ज्यादातर दवाएं बाहर से ही लेनी पड़ती हैं। कहने को तो अस्पताल
में सभी 427 दवाएं मौजूद हैं लेकिन जब दवा लेने की बात आती है तो एंटी
रैबीज और एंटी स्नेक तक के टीम सिविल अस्पताल में नहीं मिलते। ध्यान रहे कि
एंटी रैबीज का बाजार में 350 रुपये का टीका है, जो सिविल अस्पताल में
मुफ्त उपलब्ध होना चाहिए।
एंटी बायोटिक और एंटी एसिड दवाओं की कमी
सिविल
अस्पताल में एंटी बायोटिक व एंटी एसिड दवाओं का ज्यादातर टोटा ही रहता है,
जबकि सिविल अस्पताल में पहुंचने वाला लगभग हर मरीज एसिड से परेशान आता है।
डॉक्टर लिखते कुछ दवा हैं और उसे एंटी एसिड के नाम पर फार्मासिस्ट अन्य
एल्टरनेट दवाएं थमा देते हैं। ऐसे में मरीज को आराम नहीं मिलता या फिर उसे
वह दवा बाहर से लेेनी पड़ती है। इसी तरह ओफ्लोक्सिीन, लिवोफ्लोक्सिीन व 600
एमजी की आने वाली ज्यादातर एंटी बायोटिक दवाओं का भी सिविल अस्पताल में
अकसर टोटा ही रहता है। यह वे दवाएं हैं जो वायरल के दौरान जरूरी होती हैं।
इसी तरह दर्द निवारक ट्यूब भी बाहर से ही लिख दी जाती हैं।
एक साल से बंद पड़ी टोकन मशीनें
सिविल
अस्पताल में दवा लेने आने वाले मरीजों को दवाई लेने से पहले एक जंग लड़नी
पड़ती है। दवा लेने से पहले पर्ची बनवाने के लिए ही घंटों कतारों में खड़ा
होना मरीजों की नियति बन चुका है। पर्ची कटवाने के बाद दवा लेने के लिए भी
कुछ इसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। दवा लेने के लिए टोकन सिस्टम की
शुरुआत की गई थी। जो एक साल से बंद पड़ी है। टोकन मशीनें होने से हर मरीज
को दवा लेने के लिए लाइन में प्रतिदिन एक से दो घंटे तक का इंतजार करना
पड़ता है। इसी तरह किसी भी डाक्टर के कमरे में टोकन मशीन की व्यवस्था नहीं
है और इलाज के लिए भी स्थिति ऐसी ही बनी रहती है।
अस्पताल के बाहर से ही मिलती है दवा
हैरत
की बात तो यह है कि जिन दवाओं को डॉक्टर बाहर से लिखते हैं, उनमें से
ज्यादातर महंगी दवाएं अस्पताल से बाहर ही दुकानों पर ही मिलती हैं। शनिवार
को कुरलन गांव के मुकेश के पेट में दर्द था, उन्होंने जैसे तैसे डाक्टर से
दवा तो लिखा ली, लेकिन इसमें से तीन दवाएं बाहर से फार्मासिस्ट ने लिख दी।
मुकेश ने जब जलमाना जाकर इन दवाओं के बारे में पूछा तो वहां दवाएं नहीं
मिली। हारकर मुकेश करनाल दोबारा आया तब जाकर यहीं से वह दवाएं मिलीं।
कोट
अस्पताल
में लगभग सभी दवाएं उपलब्ध हैं। फिर भी यदि डॉक्टर जरूरी दवाओं को बाहर से
लिखते हैं और शिकायत मिलती है तो उस पर निश्चित तौर पर कार्रवाई की जाएगी।
कई बार स्टॉक में दवा खत्म हो जाती है, हो सकता है इस कारण कुछ दिक्कत
किसी मरीज को रही हो। लेकिन अस्पताल में एंटी रैबीज और एंटी स्नेक सहित
लगभग हर एंटीबायोटिक जोकि विभागीय लिस्ट में है वह मौजूद हैं।
डाक्टर योगेश, पीएमओ, मेडिकल कालेज एवं अस्पताल करनाल।
अभी स्टाक खत्म एक दो दिन में ले जाना
इंद्री।
इंद्री सीएचसी में आने वाले बीमार व्यक्तियों के लिए दवाएं न मिलना
परेशानी का सबब बन चुका है। सीएचसी में मरीजों को ज्यादातर दवाइयां भी बाहर
से ही खरीदनी पड़ती है। स्वास्थ्य केंद्र में तैनात डॉक्टर बीमार लोगों को
दवाएं बाहर से ही मंगवाते हैं। यहां आने वाले मरीजों को रटा-रटाया जवाब
मिलता है कि अब स्टाक खत्म हो गया। एक दो दिन में दवाइयां आने वाली है।
शनिवार को केंद्र में अपनी बीमारी का इलाज कराने के लिए आए दर्जनों लोगों
का कहना है कि पहले तो पर्ची बनवाने वाले काउंटर पर उन्हें करीब एक घंटे तक
इंतजार में खड़ा रहना पड़ा। उसके बाद डॉक्टर के पास चैक कराने के लिए भी
घंटों इंतजार करना पड़ता है। आलम यह है कि सुबह दस बजे से पहले सामुदायिक
स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर नहीं आते जब डॉक्टर आता है उस समय तक लंबी
कतारें लग जाती हैं।
रात के समय स्टाफ नर्स ही चलाती हैं सीएचसी
घरौंडा।
शहर की सीएचसी के तहत चार पीएचसी पड़ती है। रात के समय पीएचसी में किसी
डॉक्टर की ड्यूटी नहीं होती केवल अस्पताल स्टाफ नर्स के भरोसे चलते हैं।
पीएचसी में डॉक्टरों की कमी है। ग्रामीण क्षेत्र के चार स्वास्थ्य केंद्रों
में केवल दो एंबुलेंस है। इससे ग्रामीण क्षेत्र के साधनहीन लोगों को
परेशानी का सामना करना पड़ता है। मजबूरन लोगों को गांव में प्राइवेट
दुकानों व अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है। घरौंडा के सामुदायिक
स्वास्थ्य केंद्र के अधीन गांव बरसत, चौरा, कुटेल और गगसीना प्राथमिक
स्वास्थ्य केंद्र आते हैं। पीएचसी में डॉक्टरों की पोस्ट दो दो सेंक्शन
हैं, लेकिन पोस्टिंग एक डॉक्टर की गई है। स्टाफ का अभाव है तथा दवाओं की
पूर्ति सही नहीं हो रही। गांव बरसत की पीएचसी में अस्पताल का निर्माण बहुत
कम जगह में हो रहा है, जिससे मरीजों के लिए बनाए गए वार्ड छोटे हैं। पीएचसी
में पांच बेडों का होना जरूरी है, लेकिन दो बेडों के सहारे ही काम चलाना
पड़ रहा है। इस प्रकार की स्थिति लगभग सभी स्वास्थ्य केंद्रों में है। शहर
से सभी पीएचसी लगभग आठ से दस किलोमीटर दूरी पर है। मजबूरन मरीजों को करनाल व
घरौंडा का सहारा लेना पड़ता है।