पूर्व मंत्री मीना मंडल की मौत से न केवल कांग्रेस को पूरे क्षेत्र को
झटका लगा है। वे दलितों की नेता मानी जाती थीं और उनकी पिछड़े लोगों में
जबरदस्त पकड़ भी थी। वे वर्ष 2005 में जुंडला विधानसभा सीट विधायक चुनी गई
और उनकी कार्यकर्ताओं पर पकड़ को देखते हुए उन्हें कांग्रेस ने मंत्रिमंडल
भी शामिल किया था।
इस दौरान उन्होंने जुंडला क्षेत्र का खूब विकास कराया
था, साथ ही लोगों को रोजगार भी उपलब्ध कराया था। मीना मंडल को राजनीतिक
परिवार से मिली। उनके पिता सागर चंद मंडल ने भी जुंडला विधानसभा से चुनाव
लड़ा था, लेकिन वे चुनाव नहीं जीत पाए थे। मीना मंडल ने भी जमीनी स्तर से
उठकर कांग्रेस के लिए काम किया और एक दिन मंत्री बनी। इसके बाद वर्ष 2009
में नए परिसीमन के कारण जुंडला विधानसभा सीट खत्म हो गई और इसे असंध में
मर्ज कर दिया गया। ऐसे में रिजर्व सीट नीलोखेड़ी से कांग्रेस की टिकट पर
उन्होंने चुनाव लड़ा, लेकिन वे हार गई।
इनेलो के मामूराम गोंदर ने उनको
हराया था। इस बार विधानसभा चुनाव में उनको टिकट नहीं मिला था। फिलहाल वे इस
समय कांग्रेस पार्टी की राज्य उप प्रधान थीं। मीना मंडल के पति बैंक से
रिटायर्ड हैं और उनके पास दो बच्चे एक लड़का और एक लड़की हैं। उनकी मौत से
कार्यकर्ताओं में शोक की लहर है। उनकी मौत पर शहर के नेताओं व कार्यकर्ताओं
ने शोक जताया है।
डेंगू पर फिर उठे सवाल
स्वास्थ्य की बात करें
तो डेंगू से प्रशासन एक भी मौत से इंकार कर रहा है, लेकिन मौतें लगातार हो
रही हैं और प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग कुछ नहीं कर पा रहा है। बता दें कि
पूर्व मंत्री मीना मंडल हांसी रोड पर रहती थी और उन्हें डेंगू के बाद शहर
के निजी अस्पताल में दाखिल कराया था, लेकिन हालात खराब होने के कारण और
प्लेटलेटस ज्यादा डाउन होने के कारण गत दिनों मेदांता अस्पताल में रेफर कर
दिया गया था। सवाल यह है कि आखिर डेंगू शहर में जानलेवा साबित हो रहा है और
प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है।