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नेताजी के साथ आजादी की जंग में कूदे, जेल में सही थी कठोर यातनाएं

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मेजर देवेंद्र नाथ मोहन की तस्वीर के साथ उनकी पत्नी सुदेश रानी और बेटी प्रवीण मेहता। संवाद
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माई सिटी रिपोर्टर
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करनाल। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ नारे और उनके कार्यों से प्रभावित होकर कर्ण नगरी के देवेंद्रनाथ मोहन भी आजादी की जंग में कूद पड़े थे। 28 अगस्त 1929 को बर्मा में जन्मे देवेंद्रनाथ मोहन को ब्रिटिश सेना द्वारा दी गई जेल यातनाएं भी सहनी पड़ीं। 11 अप्रैल 1945 को उन्हें रंगून जेल में डाल दिया गया, जहां से वे फरवरी 1946 में रिहा हुए। इसके बाद भी उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए नेताजी का साथ दिया।
महज 14 साल की उम्र में आजाद हिंद फौज में जाने के बाद देवेंद्रनाथ मोहन देश को आजाद कराने के बाद ही घर लौटे। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उनके आक्रोश को देखते हुए उन्हें नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अंगरक्षक के रूप में भी काम करने का मौका मिला। उनके हौसले और जज्बे का ही परिणाम रहा कि स्वतंत्र भारत में उनकी भारतीय सेना में सिपाही पद पर नियुक्ति हुई। अपने 36 साल के सेना के सेवा काल में मेजर रैंक तक पहुंचे। जहां गोवा मिशन के अलावा 1962 और 1965 के युद्ध में भी दुश्मनों के दांत खट्टे करने का मौका मिला। रिटायरमेंट के बाद जब वे करनाल आकर रहने लगे तो यहां भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ, वह युवाओं में देश सेवा का जोश भरते रहे। ब्यूरो
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‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी’ दूंगा नारे से हुए प्रभावित
करनाल के संत नगर में रह रहीं उनकी पत्नी सुदेश रानी ने बताया कि वे नेताजी के ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ नारे और नेता जी के कार्यों से काफी प्रभावित थे। देवेंद्र नाथ मोहन को ब्रिटिश सेना द्वारा दी गई जेल यातनाएं भी सहनी पड़ीं। 11 अप्रैल 1945 को उन्हें रंगून जेल में डाल दिया गया, जहां से वे फरवरी 1946 में रिहा हुए। 1948 में भारतीय सेना में सिपाही पद पर उनकी नियुक्ति हुई। 31 अगस्त 1984 को वे मेजर के पद से सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद मेजर ने करनाल में अपना घर बनाया, इससे पहले जहां पोस्टिंग होती थी, वहीं परिवार रहता था। इस वीर सपूत ने कर्ण नगरी में ही प्राण त्यागे। अपनी बड़ी बेटी प्रवीण मेहता के साथ उनकी पत्नी इसी मकान में पति की यादों को सहेजे हुए हैं।
सेना में जीते 20 से ज्यादा खिताब
- सरकार की ओर से ताम्र पत्र और सेना से बॉर्डर रोड दंतक पुरस्कार मिला।
- जनवरी 1973 में 11 वायरलेस एक्सपेरीमेंट यूनिट का खिताब मिला।
- जनवरी 1978 में चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ की ओर से 1973 से 1977 तक इस्टर्न सेक्टर में बेहतरीन सेवाओं के लिए खिताब मिला।
- जुलाई से अक्तूबर 1983 में बेस्ट सेवाओं के लिए पुरस्कार मिला।
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