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Karnal News: बंद हो चुकी फर्म के नाम पर लिया गया बीमा अमान्य

Tue, 10 Feb 2026 01:31 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
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संवाद न्यूज एजेंसी
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करनाल। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बीमा क्लेम से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई बीमा पॉलिसी ऐसी फर्म के नाम पर ली जाती है जो अस्तित्व में ही नहीं है, तो वह अनुबंध शुरू से ही शून्य माना जाएगा। आयोग ने शिवा ट्रेडर्स की ओर से दायर शिकायत को खारिज कर दिया है, जिसमें दुर्घटनाग्रस्त ट्रक के लिए बीमा राशि की मांग की गई थी ।
चमन गार्डन निवासी एवं शिवा ट्रेडर्स के प्रोपराइटर शिकायतकर्ता नितिन सिंगला ने अपने टाटा एलपीटी 407 एचआर 45सी 0230 वाहन का बीमा न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी से एक जुलाई, 2021 से 30 जून, 2022 की अवधि के लिए करवाया था। 27 अगस्त, 2021 को ट्रक का टायर फटने से वह सड़क पर पलट गया। शिकायतकर्ता ने मेट्रो मोटर्स से एक लाख 21 हजार 691 रुपये में वाहन की मरम्मत करवाई और क्लेम के लिए बिल कंपनी को सौंपे।
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बीमा कंपनी ने 21 मार्च, 2022 को यह कहते हुए क्लेम खारिज कर दिया कि जिस शिवा ट्रेडर्स के नाम पर पॉलिसी ली गई, वह फर्म बीमा शुरू होने से पहले ही 30 जून 2021 को बंद हो चुकी थी। इस पर आयोग के समक्ष शिकायतकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि वाहन का बीमा वैध था और प्रीमियम का भुगतान किया गया था, इसलिए कंपनी मरम्मत का खर्च देने के लिए बाध्य है।
कंपनी के वकील ने दलील दी कि पॉलिसी परम सद्भाव के सिद्धांत पर आधारित होती है। शिकायतकर्ता ने यह तथ्य छिपाया कि फर्म बंद हो चुकी है और उसका जीएसटी नंबर व बैंक खाता भी सरेंडर कर दिया गया है। अतः गैरमौजूद इकाई के नाम पर ली गई पॉलिसी कानूनी रूप से वैध नहीं है।
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उपभोक्ता ने तथ्यों को छिपाया
आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह और सदस्यों ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि उपभोक्ता ने तथ्यों को छिपाया है। सामने आया कि फर्म 30 जून, 2021 को बंद हो गई थी, जबकि बीमा पॉलिसी एक जुलाई, 2021 से प्रभावी होने के लिए ली गई थी। यानि जब बीमा प्रभावी हुआ, तब फर्म का कोई कानूनी अस्तित्व ही नहीं था। आयोग ने पाया कि शिकायतकर्ता ने सर्वेक्षक और क्लेम फॉर्म में फर्म के अस्तित्व के बारे में गलत जानकारी दी। आयोग ने बीमा कंपनी की ओर से क्लेम को खारिज करने के निर्णय को सही ठहराया और शिकायतकर्ता की याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया। इस प्रकार आयोग ने स्पष्ट किया कि बीमा लेते समय संबंधित कानूनी इकाई का सक्रिय होना अनिवार्य है, अन्यथा क्लेम मिलना मुश्किल हो सकता है।
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