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तीन साल में दो मीटर तक गिरा भू-जल स्तर

Fri, 13 May 2016 12:34 AM IST
ब्यूरो/करनाल,अमर उजाला
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करनाल जिले में धान की अगेती बुआई से साल दर साल भू जल स्तर गिरता जा रहा है। पिछले तीन सालों में जिले का भू जल स्तर करीब दो मीटर तक खिसक गया है। हालांकि, जिले में  आज तक किसानों पर सूखे की मार नहीं पड़ी है, लेकिन जिस प्रकार सबमर्सिबल पंपों से लगातार पानी का दोहन हो रहा है, उसके भू-जल स्तर में गिरावट आ रही है। पानी की बचत को लेकर कृषि विभाग व सरकार भी कोई ध्यान नहीं दे रही है। यदि समय रहते पानी की बचत को लेकर कोई कदम नहीं उठाया गया तो, आने वाले दो तीन दशक में जिले में भी सूखे के हालात बन सकते हैं।
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करनाल में प्रतिवर्ष करीब 1.62 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की रोपाई हो रही है। धान को पानी की अधिक आवश्यकता होती है। इसलिए किसान बिना सोचे समझे ही पानी का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं। पिछले करीब 10 सालों से जिले में साधारण ट्यूबवैल तो लगभग समाप्त हो चुके हैं, जो पहले 100 से 150 फुट पर लगते थे। उनकी जगह अब सबमर्सिबल पंपों ने ले ली है। ये पंप एक हजार से 1500 फुट तक नीचे गहराई पर लगते हैं, जो एक घंटा चलने पर ही करीब सवा लाख लीटर पानी का भू गर्भ से खींच रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से बरसात कम होने की वजह से जिले में नहरी सिंचाई क्षेत्र भी पांच प्रतिशत तक घटा है। पिछले तीन वर्षों में जिले में औसत बारिश 690 एमएम हुई है। कम बारिश के चलते धान की फसल के लिए पानी की खपत ट्यूबवेल से पूरी हुई है। इसी वजह जिले का भू-जल स्तर दो मीटर तक खिसक गया है।

धान के कटोरे में सबसे ज्यादा पानी का दोहन
करनाल, कैथल और कुरुक्षेत्र के एरिया को धान का कटोरा कहा जाता है। इन तीनों जिलों में सबसे ज्यादा धान की फसल लगाई जाती है। वैज्ञानिक मानते हैं कि किसी भी फसल के लिहाज से धान की फसल को सबसे ज्यादा पानी चाहिए होता है। इसलिए इन तीनों जिलों में भूजल की स्थिति गंभीर होती जा रही है और हर साल पानी नीचे होता जा रहा है। अब तो हालात यहां तक होने लगे हैं कि सबमर्सिबल पंप भी जवाब देने लगे हैं। इस बारे में भाकियू के प्रदेशाध्यक्ष रत्न मान ने कहा कि किसानों को जागरूक होना होगा। पारंपरिक फसलों को छोड़कर आधुनिक खेती करनी चाहिए।   
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वर्जन
जिले में 1.62 लाख हेक्टेयर भूमि पर धान व गेहूं की फसल लगाई जाती है। धान की फसल को पानी की आवश्यकता अधिक होती है। इसलिए किसानों को मानसून के आने के बाद ही धान की रोपाई शुरू करनी चाहिए। इससे उनकी खर्च भी कम होगा तथा पानी की भी बचत होगी। पिछले कुछ वर्षों से बारिश की मात्रा में भी करीब 200 एमएम कमी आई है। पिछले तीन सालों से जिले में ओसतन बारिश 690 एमएम हो रही है। प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के जिले में कम से कम 900 एमएम बारिश होनी चाहिए। बारिश कम होने की वजह से जिले नहरी सिंचाई क्षेत्र भी पांच प्रतिशत घटा है। इसलिए किसानों को पानी की बचत के लिए धान के रकबे में कमी लाने की जरूरत है या फिर किसान धान की सीधी बिजाई कर खर्च कम कर सकते हैं।
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डा. देविंद्र सिंह बुंदेला, मौसम विशेषज्ञ, सीएसएसआरआई करनाल।
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