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Karnal News: ढाई दशक में पांच गुना गिरा कर्णनगरी का भूजल स्तर

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सुखदेव चौहान
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करनाल। गिरता भूजल स्तर लोगों के भविष्य के लिए खतरा बनता जा रहा है।
जिले में 90 प्रतिशत भूमिगत जल का इस्तेमाल किया जाता है, शेष 10 प्रतिशत ही नहरों के पानी का सिंचाई में उपयोग होता है। इस कारण से भूमिगत जल स्तर लगातार गिर रहा है। करनाल में भू जल स्तर 1974 से वर्ष 2000 तक साढ़े तीन मीटर नीचे चला गया था। वहीं वर्ष 2000 से अब तक भूजल स्तर 17 मीटर यानी पांच गुना नीचे चला गया है।
जिले के इंद्री खंड को छोड़कर बाकी सभी खंड डार्क जोन में शामिल हैं। वर्ष 2000 में ही जिले में सबमर्सिबल पंप अस्तित्व में आए, उससे पहले नलकूपों के माध्यम से ही पेयजल की आपूर्ति की जाती थी। कृषि विभाग के भूजल सेल से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार पिछले दो दशक में जिले का भूजल स्तर लगभग 16.86 मीटर से ज्यादा नीचे चला गया है। जिले की जल तालिका जो कि वर्ष दो हजार में लगभग 8.57 मीटर थी और अब वर्तमान में करीब 27.81 मीटर हो गई है। जिले में हजारों अवैध बोरवेल हैं और कई बड़े प्रतिष्ठानों ने तो अधिसूचित क्षेत्रों में भूजल दोहन की अवैध रूप से अनुमति ले रखी है।
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विशेषज्ञों की मानें तो ऐसी स्थिति के पीछे भूमि जल का अधिक प्रयोग और जल का कम संरक्षण मुख्य कारण है। आंकड़ों के अनुसार जिले के भूजल स्तर में सबसे ज्यादा गिरावट 1999 के बाद शुरू हुई है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण कृषि में सिंचाई के लिए सबमर्सिबल ट्यूबवेल का प्रयोग है।
अब लोगों ने अपने घर, अस्पताल, स्कूल और होटल सहित बड़े संस्थानों में भी सबमर्सिबल पंप का उपयोग शुरू कर दिया है। अब करनाल के इंद्री खंड को छोड़कर जिले में सात खंड अति-शोषित श्रेणी में आ गए हैं। डार्क जोन घोषित क्षेत्र में सिंचाई के लिए भूजल कनेक्शन लेना भी टेढ़ी खरी साबित हो रहा है।
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जनभागीदारी जरूरी ः यदि हम अपने भविष्य को सुरक्षित रखना चाहते हैं, पानी की कमी से नहीं जूझना चाहते हैं तो जल संचयन के लिए जनभागीदारी के साथ-साथ जन आंदोलन जरूरी है। इस दिशा में अटल भूजल योजना भी कारगर सिद्ध हो रही है। इस योजना के तहत जिले की 41 ग्राम पंचायतों को लिया गया है। दो साल के भीतर इनमें से 14 ग्राम पंचायतों में भूजल स्तर सुधरा है। अभियान की टीम व गांव में भूजल सहेलियां लोगों को भूजल संरक्षण के लिए जागरूक कर रही हैं। संवाद
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