दिवाली पर पटाखों की खरीद-बिक्री पर प्रशासन की ओर से लगाया गया प्रतिबंध बेअसर साबित हुआ। देर रात तक आतिशबाजी ने पर्यावरण में खूब जहर घोला। इससे एक्यूआई 950 तक पहुंच गया।
राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के आदेशों पर जिला प्रशासन ने आतिशबाजी करने और पटाखों की बिक्री पर धारा-144 के तहत प्रतिबंध लगाया था। इसके बावजूद गली-मोहल्लों में किराना दुकानों व रेहड़ी-फड़ी पर आतिशबाजी के सामानों की बिक्री हुई। यही कारण है कि दिवाली के दिन रातभर धमाके होते रहे। आतिशबाजी को रोकने या कार्रवाई करने वाला कहीं कोई अधिकारी या कर्मचारी नजर नहीं आया। नतीजतन शनिवार की रात 12 से दो बजे के बीच एक्यूआई स्तर 950 तक पहुंच गया, जबकि दीपावली से पहले करनाल में एक्यूआई का स्तर 150 से 200 के बीच था।
ध्वनि प्रदूषण 120 डेसिबल तक
पटाखों के धमाके से वन्य जीव-जंतुओं में भी बेचैनी बनी रही। किसी भी शहर में सामान्यत: ध्वनि का स्तर 20 से 30 डेसिबल तक मिलता है, लेकिन पटाखों के धमाकों की वजह से यह 100 से 120 के बीच आंका गया, जो आमजन के साथ ही जीव-जंतुओं के लिए भी परेशानी का सबब बना।
आतिशबाजी से घातक गैसों का उत्सर्जन
आतिशबाजी का सामान बनाने में आक्सीडाइजर, फ्यूल व रंग प्रदान करने वाले केमिकल इस्तेमाल किए जाते हैं। आक्सीडाइजर के रूप में पोटेशियम नाइट्रेट तथा स्पार्क के लिए सल्फर, गंधक, एल्यूमीनियम पाउडर, मैग्नीशियम पाउडर व जिंक पाउडर मिलाए जाते हैं। रंग देने के लिए कैल्शियम नाइट्रेट, बेरियम एसिटेट, क्यूपरिक क्लोराइड इत्यादि रसायन इस्तेमाल किए जाते हैं। मिश्रण में बजरी, लोहे के छर्रे, रेत, चिपकाने के लिए लेही का प्रयोग किया जाता है। इसके चलते आतिशबाजी से सल्फर डाइआक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन सल्फाइड, अधजले कार्बन के कण एवं अन्य जहरीले तत्व वातावरण में घुलते हैं।
कोरोना संक्रमण का खतरा अधिक
पर्यावरणविद एवं प्राचार्य डा. राकेश भारद्वाज ने कहा कि कार्बन मोनोआक्साइड से सांस लेने में तकलीफ होती है। इससे फेफड़ों में आक्सीजन की कमी आ जाती है और घुटन महसूस होती है। फेफड़ों में कोरोना संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है।