साल 1984 के दंगों का मंजर आज भी कंवलजीत सिंह और उनके परिवार को सोने नहीं देता। आंखों के आगेे दंगों में जले घर और परिवार के सदस्यों पर हुए हमले का दर्द एक ‘मर्ज’ बन गया है।
उस पर विडंबना यह है कि 30 साल बाद आज तक कंवलजीत सिंह की एफआईआर तक दर्ज नहीं की गई। दंगों में नुकसान का मुआवजा मिलना तो दूर, प्रधानमंत्री कार्यालय और हरियाणा सरकार के प्रधान सचिव के बीच सालों से पत्र युद्ध चल रहा है>
लेकिन कंवलजीत सिंह के मुआवजे की फाइल अब तक नहीं बनी। करनाल की पूर्व डीसी नीलम पी कासनी ने कंवलजीत सिंह का दर्द महसूस कर उसे मुआवजा दिलाने की शुरूआत जरूर की थी, लेकिन उनके तबादले के बाद फिर उसकी उम्मीद टूट गई।
शिव कालोनी में किराए के मकान में रह रहे कंवलजीत सिंह ने बताया कि 1984 के दंगों में उनका घर शकुरपुर बस्ती में था, जिसे दंगाइयों ने जला दिया था। उनके पिता को सिर में राड मारी थी और मरा समझ कर छोड़ गए थे।
उनके पिता डा. पूर्ण सिंह भल्ला इस सदमे से दिमागी रूप से बीमार हो गए और बाद में इलाज न होने के कारण उनकी मौत हो गई। उनकी माता स्वर्ण कौर, भाई गुलशन सिंह और एक बहन सरबजीत कौर भी इस हादसे के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और मुआवजे की उम्मीद दिल में लिए मर गए>
लेकिन तीस सालों में उन्हें एक रुपया भी मुआवजे का नहीं मिला। कंवलजीत की दो बार हार्ट सर्जरी हो चुकी है और वह मेहनत मजदूरी कर अपना व बच्चों का गुजारा मुश्किल से कर पाता है।
पत्र ही मिले, पैसा नहीं
कंवलजीत सिंह के मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय में 2009 से 2013 तक 7 बार केंद्रीय गृह सचिव को कार्रवाई के लिए लिखा, जिसे गृह मंत्रालय ने हरियाणा के मुख्य सचिव और मुख्य सचिव ने करनाल उपायुक्त को कार्रवाई के लिए भेज दिया।
करनाल की तत्कालीन उपायुक्त नीलम कासनी ने एक फरवरी 2012 को कंझावला (दिल्ली) के उपायुक्त को पत्र लिखकर कंवलजीत सिंह के मामले की जानकारी मांगी, जिसका उत्तर कंझावला उपायुक्त ने तीन सितंबर 2012 को दिया>
जिसमें कंवलजीत के दावे को सही पाया गया, लेकिन इसके बावजूद उसकी फरियाद एक फाइल से दूसरी फाइल में घूम रही है और धरातल पर उसे कोई मदद नहीं दी गई।
निफा और अधिकार ने थामा हाथ
सामाजिक संस्था निफा के अध्यक्ष प्रितपाल सिंह पन्नु और संस्था अधिकार के अध्यक्ष आरटीआई कार्यकर्ता एडवोकेट राजेश शर्मा ने कंवलजीत सिंह का हाथ थामा है। पन्नु ने कहा कि कंवलजीत सिंह उन हजाराें परिवारों की कहानी बयान करता है, जिसे 30 वर्षों में इंसाफ के नाम पर मात्र झूठे भाषण, आश्वासन और कागजी कार्रवाई मिली।
पन्नु ने कहा कि निफा इस मामले को लेकर नए उपायुक्त को मिलेगी और पीड़ित को इंसाफ दिलाने व मुआवजा दिलाने के लिए मांग करेगी। निफा इस मामले में मुकदमा दर्ज न करने के लिए उस समय में शकुरपुर बस्ती के थानाध्यक्ष के खिलाफ भी कार्रवाई के लिए गृहमंत्रालय को पत्र लिखेगी।
‘अधिकार’ संस्था के प्रधान आरटीआई कार्यकर्ता एडवोकेट राजेश शर्मा ने इसे मानवीय अधिकारों का घोर उल्लंघन और 1984 के दंगा पीड़ितों से अन्याय बताते हुए कहा कि वे इस मामले में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी प्राप्त करेंगे और इतने मानवीय मुद्दों पर जानबूझ कर ढिलाई बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेंगे। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को कानूनी नोटिस देने और आवश्यकता पड़ने पर कानूनी कार्रवाई करने की बात कही।