करनाल। धान की कटाई पूरी होने ही गेहूं की बुवाई का समय शुरू हो गया है। मौसम का मिजाज भी गेहूं के बुवाई के अनुकूल बन गया है। जिससे किसानों को अगेती और समय से गेहूं की बुवाई कर देनी चाहिए।
भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (आईआईडब्ल्यूआर) के निदेशक डॉ. रतन तिवारी ने किसानों को सलाह दी है कि जिसे क्षेत्र के लिए जो किस्म अनुसंशित की गई है, उस क्षेत्र में वही किसान बोएं, तब किसान बेहतर पैदावार ले सकेंगे। निदेशक ने किसानों का आह्वान किया कि वे अधिक उपज प्राप्त करने के लिए बुआई के समय और स्थिति के आधार पर बहुत सावधानी से किस्मों का चयन करें। बीज किसी विश्वसनीय स्रोत से खरीदें।
अगेती किस्में
- हरियाणा, पंजाब, राजस्थान (आंशिक), पश्चिमी उत्तर प्रदेश (सिचिंत क्षेत्र) में अगेती यानी नवंबर के प्रथम सप्ताह में बोई जाने वाली किस्मों में डीबीडब्ल्यू 187, डीबीडब्ल्यू 303, डब्ल्यूएच 1270, डीबीडब्ल्यू 327, डीबीडब्ल्यू 332, पीबीडब्ल्यू 872, डीबीडब्ल्यू 370, डीबीडब्ल्यू 371, डीबीडब्ल्यू 372 को बोया जा सकता है। वहीं मध्यप्रदेश , गुजरात, राजस्थान में डीबीडब्ल्यू 187, डीबीडब्ल्यू 303, डीबीडब्ल्यू 327, जीडब्ल्यू 543 को बोया जा सकता है।
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20 नवंबर तक बो सकते हैं
- हरियाणा, पंजाब, राजस्थान का कुछ भाग, पश्चिम यूपी के सिंचित क्षेत्र के लिए डीबीडब्ल्यू 187, डीबीडब्ल्यू 222, एचडी 3406, पीबीडब्ल्यू 826, पीबीडब्ल्यू 3226, एचडी 3086, एचडी 3386, एचडी 3411, डब्ल्यूएच 1105, डीबीडब्ल्यू 296 तथा डब्ल्यूएच 1402 (प्रतिबंधित सिंचाई) किस्मों को और पूर्वी यूपी, बिहार, बंगाल, झारखंड राज्य में डीबीडब्ल्यू 187, पीबीडब्ल्यू 826, एचडी 3411, डीबीडब्ल्यू 222, एचडी 3086, के 1006, डीबीडब्ल्यू 386, डीबीडब्ल्यू 252 तथा एचडी 3293 (प्रतिबंधित सिंचाई) और मध्यप्रदेश , गुजरात, राजस्थान में डीबीडब्ल्यू 303, डीबीडब्ल्यू 187, एचआई 1636, एचआई 1650, एमएसीएस 6768, जीडब्ल्यू 366, जीडब्ल्यू 547, एचआई 8759 (डी), एचआई 8830(डी), डीबीडब्ल्यू 110 तथा सीजी 1040 (प्रतिबंधित सिंचाई) के अलावा महाराष्ट्र, कर्नाटक राज्य में डीबीडब्ल्यू 168, डीबीडब्ल्यू 443, एमएसीएस 6478, यूएएस 304, एमएसीएस 6222, एमएसीएस 4100(डी), पीबीडब्ल्यू 891, डब्ल्यूएच 1306 किस्मों को बाया जाना चाहिए।
जलवायु के अनुसार करें चुनाव
डॉ. रतन तिवारी ने बताया कि भारत में गेहूं की फसल विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों और उत्पादन स्थितियों में उगाई जाती है। बुवाई के समय में क्षेत्र दर क्षेत्र और अलग-अलग उत्पादन परिस्थितियों में थोड़ा अंतर होता है, सिंचाई से ठीक पहले यूरिया डालनी चाहिए। बहुशाकनाशी प्रतिरोधी फलारिस माइनर (कनकी/गुल्ली डंडा) सहित विविध खरपतवार वनस्पतियों के नियंत्रण के लिए, बुवाई के 0-3 दिन बाद 60 ग्राम/एकड़ की दर से पाइरोक्सासल्फोन 85 डब्ल्यूजी का अकेले या पेंडिमेथालिन 30 ईसी 2.0 लीटर/एकड़ के साथ छिड़काव करना चाहिए। या फिर बुवाई के 0-3 दिन बाद 150-200 लीटर पानी का उपयोग करके 800 मिलीलीटर/एकड़ की दर से एक्लोनिफेन, डाइफ्लुफेनिकन, पाइरोक्सासल्फोन (मैटेनो मोर) के तैयार मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए। कठिया गेहूं में पाइरोक्सासल्फोन आधारित शाकनाशी के प्रयोग से बचना चाहिए।
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सुझाव
- अपने क्षेत्र और स्थिति के लिए सर्वोत्तम उपयुक्त किस्म चुनाव करें।
- धान के खेत में फसल अवशेषों की उपस्थिति में हैप्पी सीडर या स्मार्ट सीडर का उपयोग कर के सीधे गेहूं की बुवाई की जा सकती है।
- गर्मी के प्रतिकूल प्रभावों के नुकसान से बचने के लिए समय पर बुआई करें और बुआई करें, देरी से बचें।
- रोग की संवेदनशीलता के जोखिम से बचने के लिए अन्य क्षेत्रों की किस्में न उगाएं।
- अधिकतम उपज के लिए अपनी फसल को उर्वरक, सिंचाई जल, शाकनाशी और कवकनाशी के साथ प्रबंधित करें।
- पानी बचाने और लागत में कटौती के लिए खेतों की समय पर और विवेकपूर्ण सिंचाई करें।