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देश के किसानों को मिलेगा सीएसआर-30 बासमती का नया अवतार

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देव शर्मा
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करनाल। देश के किसानों को जल्द सीएसआर-30 बासमती का नया अवतार मिलेगा। केंद्रीय मृदा एवं लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) करनाल की ओर से 2001 में जारी की गई देश की इस इकलौती लवणरोधी (साल्ट टॉलरेंट) बासमती धान की किस्म सीएसआर-30 ने भारत ही नहीं बल्कि करीब 200 से अधिक देशों में अपनी खुशबू बिखेरी है। अब यह प्रजाति शीघ्र ही एक नए अवतार में सामने आएगी। यूं तो इसे 2012 में भी रि-नोटिफाई किया गया था, लेकिन अब वैज्ञानिक इसे और लवणरोधी बनाने के साथ-साथ इसके पौधे की लंबाई कम करने पर शोध कर रहे हैं। क्योंकि इसके पौधे की लंबाई सामान्य धान से अधिक होने के कारण तेज हवाओं में गिर जाती है। इसी कारण इसे खेतों में अपेक्षित मात्रा में लगाने में किसानों के मन में हिचकिचाहट रहती है।
सीएसआर 30 बासमती प्रजाति, जिसे असली बासमती कहा जाता है, ने अपनी खुशबू, स्वाद और चावल की लंबाई के कारण अलग पहचान बनाई है। देश में लवणीय भूमि काफी है। इस किस्म को मध्यम लवणरोधी होने के कारण देश के अधिकांश हिस्सों के लिए रिलीज किया गया था। इसका उत्पादन भी बेहतर स्थिति में रहा है, फिर भी अपेक्षा से कम है। इसका मुख्य कारण इसके पौधे की लंबाई अधिक होना माना जा रहा है। सीएसआर 30 के पौधे की लंबाई करीब 155 सेमी होती है, जबकि अन्य सामान्य तौर पर धान के पौधे की लंबाई 100 से 120 सेमी तक होती है। पौधा लंबा होने के कारण मौसम से प्रभावित हो जाता है, तेज हवाएं चलने पर यह प्रजाति खेतों में गिर जाती है। जिससे इसका उत्पादन प्रभावित हो जाता है। यही कारण है कि किसान जरूरत के मुताबिक ही बोते हैं, कारोबारी दृष्टि से उत्पादन को लेकर इसकी बुवाई को लेकर आशंकित रहते हैं। किसानों की इसी हिचकिचाहट ने सीएसएसआरआई के वैज्ञानिकों को इस पर और शोध करने के लिए विवश किया है।
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दिया जाएगा नया नाम
इसमें टॉलरेंट लेबल ईसी 6 और पीएच 9.5 है, जिसे ईसी 10 व पीएच 9.9 तक लाने की तैयारी है। इसके पौधे की लंबाई सामान्य धान की तरह ही करीब 120 सेमी करने की तैयारी है। संस्थान के निदेशक डॉ. प्रबोधचंद्र शर्मा के दिशा-निर्देशन में लगातार शोध चल रहा है। शोध सफल रहता है तो यह प्रजाति एक नए अवतार के रूप में शीघ्र सामने आएगी। संभव है, इसे नया नाम भी दिया जाए, क्योंकि 155 सेमी लंबाई वाली प्रजाति भी देश में हैं, फिर 120 सेमी लंबाई वाली प्रजाति आएगी तो दोनों में पहचान के लिए नया नाम देने की जरूरत पड़ेगी।
एक प्रजाति तैयार करने में लगता है 10 साल से अधिक का समय
एक प्रजाति को तैयार करने में करीब 10 साल या उससे भी अधिक का समय लग जाता है। सीएसआर-30 को 2001 में रिलीज किया गया था, इसके बाद 2012 में इसे रि-नोटिफाई किया था, जो कमियां रह गई थी, उन्हें दूर किया गया था। संस्थान निदेशक डॉ. पीसी शर्मा के निर्देशन में अब इस प्रजाति पर पहले से और अधिक नमक सहनशील बनाने और पौधे की लंबाई कम करने पर शोध कार्य चल रहा है। प्रारंभिक शोध परिणाम अपेक्षानुरूप हैं। आशा है कि आने वाले समय में एक नए अंदाज और नए रूप में किसानों को मिलेगी।
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- डॉ. एसएल कृष्णमूर्ति, वरिष्ठ वैज्ञानिक (धान प्रजनन) सीएसएसआरआई करनाल

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