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Karnal News: भरत मिलाप का प्रसंग सुन भावुक हुए श्रद्धालु

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- श्री महादेव वेलफेयर सोसाइटी अंसल टाउन में चल रही श्रीराम कथा
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। श्री महादेव वेलफेयर सोसाइटी अंसल टाउन की ओर से श्री महादेव मंदिर में श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है। शनिवार को कथा व्यास विनोद शास्त्री ने भरत मिलाप का प्रसंग सुनाया तो सभी भावविभोर हो गए। पंडित विनोद शास्त्री ने बताया कि अयोध्या से राम जी सीता जी और लक्ष्मण के वनवास जाने के बाद, भरत मामा के घर से आने के बाद सीधे माता के कैकई के कक्ष में श्रीराम को तलाशने जाते हैं। वनवास की जानकारी मिलने के बाद भरत रोते हुए कैकई माता को कोसते हैं कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है मगर माता कुमाता नहीं हो सकती।
भरत ने कहा कि लोग कहेंगे, भरत ने अपने भाई को राजगद्दी के लिए वनवास करा दिया। तभी कौशल्या और सुमित्रा दोनों भरत को समझाती हैं कि पिताजी अब इस दुनिया में नहीं रहे। आओ उनका अंतिम संस्कार कर राम को ढूंढ़ने जाएंगे। राजा दशरथ की मृत्यु की खबर सुनकर भरत रोने लगते हैं। कर्म पूरा कर अयोध्या से अपनी तीनों मां के साथ अपने भाई को वापस लाने के लिए वह निकल पड़ते हैं। पीछे-पीछे प्रजा चल पड़ी।
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निषाद राज से जानकारी लेकर भरत अपनी माताओं के साथ चित्रकूट पर्वत पर जाते हैं। जहां लक्ष्मण जंगल से लकड़ियां चुन रहे थे। जैसे ही चक्रवर्ती सेना और भरत को आते देखा राम के पास आते हैं और कहते हैं कि भरत बड़ी सेना के साथ हमारी ओर बढ़ रहा है। तभी राम मुस्कुराते हुए कहते हैं ठहर जाओ। अनुज भरत को आने तो दो। भरत राम के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगते हैं। फिर राम गले से लगाते हैं। भरत मिलाप के बाद तीनों माताओं का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं और माता सीता भी अपनी तीनों सास के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेती हैं।
उसके बाद भरत पिता के बारे में राम से कहते हैं कि अब हमारे बीच पिता श्री नहीं रहे यह शब्द सुनकर श्री राम और सीता लक्ष्मण व्याकुल हो शोकाकुल रहने के बाद राम को अपने साथ ले जाने के लिए मिन्नतें करते हैं।
मंत्री सुमंत और प्रजा बार-बार उन्हें अपने साथ जाने के लिए मनाते हैं। मगर श्रीराम कहते हैं कि पिता के दिए हुए वचन का मर्यादा नहीं टूटे। इसके लिए हमें यहां रहने की अनुमति दें। रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाय पर वचन न जाई। यह कहकर लेने आए सभी लोगों को चुप करा देते हैं मगर भरत मानने के लिए तैयार नहीं होते हैं। तब राम ने कहा प्रजा हित के लिए तुम्हें जाओ, अयोध्या के प्रजा जनों को देखना है। साथ में माताओं का भी दायित्व निर्वाह करना है। भरत श्री राम के चरण पादुका अपने सिर पर उठाकर वहां से विदा होते हैं।
14 वर्ष तक श्री राम के चरण पादुका को अयोध्या के राज सिंहासन पर रखकर खुद जमीन पर चटाई बिछाकर संन्यासी का जीवन व्यतीत करते हुए राजपाट संभालते हैं। शास्त्री ने जब भरत के प्रसंग को सुनाया तो सभी की आंखों में आंसू आ गए।
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मुख्य यजमान के रूप में पंकज गुप्ता, वंदना गुप्ता, संजीव कुमार, दीना देवी, रामकर्ण गुप्ता और सुशीला देवी ने परिवार सहित शिरकत की। इस दौरान नवीन मित्तल ने बताया कि कथा का आयोजन 22 जनवरी तक किया जाएगा। कथा का समय प्रतिदिन दोपहर दो से सायं पांच बजे तक रखा गया है। मौके पर प्रधान रणबीर रमन, उप-प्रधान नितिन दीवान, अजीत वर्मा, कपिल देशवाल, नरेश पांचाल व सचिन दीवान मौजूद रहे।
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