माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। महाराष्ट्र सरकार भी अब जलभराव और काली मिट्टी वाले क्षेत्रों की फसलों की पैदावार के लिए करनाल के केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) की ओर से विकसित उपसतही जल निकासी तकनीक (एसएसडी) का उपयोग करेगी। इसके लिए महाराष्ट्र के सिंचाई अनुसंधान और विकास निदेशालय (जल संसाधन विभाग) के तकनीकी अधिकारियों के एक दल को पांच दिवसीय विशेष प्रशिक्षण के लिए करनाल भेजा है। यहां के वैज्ञानिकों ने उन्हें प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया है।
प्रशिक्षण के पहले सत्र का उद्घाटन सीएसएसआरआई के निदेशक डॉ. राजेंद्र कुमार यादव ने किया। इस दौरान उन्होंने 1969 में संस्थान की स्थापना के बाद विभिन्न गतिविधियों के साथ साथ उपसतही जल निकासी तकनीक पर प्रकाश डाला। उन्होंने संस्थान के तीन प्रमुख नवाचारों को विशेष रूप से रेखांकित किया जो टिकाऊ कृषि के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुए हैं, पहला सोडिक भूमि के सुधार हेतु जिप्सम तकनीक, दूसरा जलभरित लवणीय मृदाओं के प्रबंधन के लिए उपसतही जल निकासी (एसएसडी) और तीसरा लवणता सहनशील फसल किस्मों का विकास।
विभागाध्यक्ष एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. सत्येंद्र कुमार ने प्रतिभागियों का स्वागत कर जलभराव और लवण प्रभावित पारिस्थितिकी में जल निकासी संबंधी समस्याओं के समाधान में इंजीनियरों की महत्वपूर्ण भूमिका को बताया। प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. डीएस बुंदेला ने महाराष्ट्र राज्य में उप-सतही जल निकासी प्रौद्योगिकी की स्थिति और चुनौतियों पर प्रकाश डाला।