करनाल। भविष्य में इथेनाल बनाने पर चीनी मिलें ज्यादा जोर देंगी। इसके पीछे कारण है कि केंद्र सरकार चीनी के निर्यात पर सब्सिडी बंद करने जा रही है। इसकी प्रमुख वजह देश में चीनी का अधिक उत्पादन और खपत कम है। इसलिए सरप्लस चीनी की जगह इथेनाल का उत्पादन कर फ्यूल में इस्तेमाल किया जाएगा।
यह निर्णय मुंबई में 20 से 22 मई तक नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज नई दिल्ली की ओर से चीनी और इथेनॉल की खपत विषय पर आयोजित सेमिनार में लिया गया। हरियाणा स्टेट शुगर फेडरेशन के प्रतिनिधि के रूप में करनाल सहकारी चीनी मिल की प्रबंध निदेशक अदिति इस सेमिनार में शामिल हुई थीं। उन्होंने वापस लौटने पर शनिवार को सेमिनार के पहलुओं का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इथेनॉल के पेट्रोलियम पदार्थों में मिश्रण करने से कच्चे तेल के आयात में कमी आएगी और विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी। अतिरिक्त चीनी को इथेनॉल में परिवर्तित करने से विदेशों से आने वाले कच्चे तेल की मांग कम हो जाएगी। बताया कि पिछले कुछ वर्षों में देश में चीनी का उत्पादन खपत से बहुत ज्यादा हुआ है। इस कारण चीनी की कीमतों में इजाफा नहीं हो पा रहा है और चीनी मिलें लागत से कम भाव पर चीनी को बाजार में बेचने पर मजबूर हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चीनी का उत्पादन जरूरत से ज्यादा होने की वजह से इसके विक्रय मूल्य में कमी आती है। इस समस्या से निजात पाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार द्वारा निर्यात सब्सिडी दी जाती थी ताकि देश की जरूरत से ज्यादा चीनी के स्टाफ को दूसरे देशों को निर्यात किया जा सके। निकट भविष्य में सरकार द्वारा चीनी पर निर्यात सब्सिडी बंद करने का प्रस्ताव है।
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किसानों को होगा आर्थिक लाभ
सेमिनार में कहा गया कि इथेनॉल एक प्रदूषण रहित इंधन है। इसके इस्तेमाल से निकलने वाली प्रदूषित गैसों की मात्रा में भी कमी होगी और इसके उपयोग से वातावरण भी शुद्ध रहेगा। देश में चीनी के बंपर उत्पादन को संतुलित करने किसानों को समय पर गन्ने का भुगतान करने के मद्देनजर केंद्र सरकार की गन्ने के रसब्बी हैवी शीरे से एथेनॉल बनाने की नीति लाभदायक है। इस विधि को अपनाने से चीनी एवं इथेनॉल के उत्पादन में संतुलन स्थापित होगा जिससे मिलों के साथ-साथ किसानों को भी आर्थिक लाभ होगा।