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Karnal News: महापंचायत में उठाया चकबंदी की जमीन का मुद्दा

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किसान बोले, कोर्ट के आदेश के बावजूद किसानों को जमीन नहीं सौंप रहा प्रशासन
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संवाद न्यूज एजेंसी
मधुबन। चकबंदी विवाद के चलते शनिवार को तीन गांवों के किसानों ने अपने दस्तावेज एसडीएम ऑफिस में जमा करवाए। वहीं, रविवार को दूसरे पक्ष के किसानों ने गांव कैरवाली में महापंचायत कर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद किसानों को उनकी जमीन न देने का आरोप लगाया। किसानों का कहना है कि उन्हें 30 वर्षों से न्याय का इंतजार है।

घरौंडा क्षेत्र में काफी गांवों के बीच चकबंदी जमीन को लेकर विवाद चल रहा है। जिसके चलते रविवार को गांव कैरवाली में किसानों की महापंचायत हुई। महापंचायत में सरपंच प्रतिनिधि सतपाल सिंह, पूर्व सरपंच निशांत राणा, देवेंद्र सिंह अमृतपुर व अन्य किसानों ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट तक का फैसला उनके हक में आ चुका है, लेकिन राजनीतिक दबाव और भूमाफिया के कारण सैकड़ों किसानों को उनकी भूमि नहीं मिल रही। महापंचायत में पहुंचे सैकड़ों किसानों ने एलान किया कि सरकार और प्रशासन कोर्ट के निर्णय को जल्द लागू करे।
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किसानों ने कहा कि भूमाफिया के 50 लोग एक हजार एकड़ से अधिक भूमि पर कब्जा किए हैं। जबकि जमीन 30 वर्ष पहले ही पात्र पांच सौ किसानों को मिलनी चाहिए। किसानों का आरोप है कि भूमाफिया अवैध कब्जे की जमीन से हर साल करोड़ों रुपए कमा रहा है।

गांव कैरवाली, कालरम अराईपुरा, भरतपुर अमृतपुर कलां व अमृतपुर खुर्द व अन्य गांवों के किसानों का चकबंदी को लेकर पिछले करीब 60 वर्षों से यह विवाद चला आ रहा है। तीन गांव के दोनों पक्ष के किसान जमीन पर अपना अपना दावा जता रहे हैं और अनेक बार इस जमीन पर भारी तनाव भी हो चुका है। जिसको लेकर कई बार प्रशासन ने इन किसानों के बीच हस्तक्षेप करते हुए मामले को निपटाने की बात कही थी, लेकिन पिछले कई वर्षों से प्रशासन द्वारा इस मामले को न निपटाए जाने के कारण दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गए थे।
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इस विवाद में कई बार राजनीतिक हस्तक्षेप भी हुआ लेकिन उसके बावजूद कोई हल नहीं निकल पाया है। पिछले तीन दिन पहले भी एसडीएम कार्यालय में सांसद संजय भाटिया, उपायुक्त अनीश यादव समेत अनेक प्रशासनिक अधिकारियों ने दोनों पक्षों की बैठक कर मामले को निपटाने का प्रयास किया था और दोनों पक्षों के दस्तावेज कार्यालय में जमा करवाने को कहा था। बताया जा रहा है कि उन दस्तावेजों की जांच प्रशासन द्वारा की जा रही है। जहां एक तरफ एक पक्ष इस जमीन पर मुट्ठी भर भू माफियाओं का कब्जा बता रहे हैं, दूसरी तरफ दूसरा पक्ष 1938 से इस जमीन पर अपना दावा जताता आया है।
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