करनाल। गन्ने की सीओ-0238 प्रजाति में कैंसर कहे जाने वाले लालसड़न रोग के लक्षणों ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। इसके साथ ही रोकथाम के लिए प्रयास भी तेज हो गए हैं।
गन्ना प्रजनन संस्थान क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र करनाल के अध्यक्ष एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एसके पांडे और प्रधान वैज्ञानिक (पादप रोग) डॉ. एमएल छाबड़ा ने कहा कि उत्तर भारत के जिन राज्यों में यह किस्म लगाई गई है, उनमें किसानों को इस रोग के नियंत्रण के उपाय बताए जा रहे हैं। गन्ने में यह असाध्य रोग है और जिस किस्म में इसका आगमन हो जाता है, वह धीरे-धीरे खेतों से हटानी पड़ती है। उत्तर भारत के राज्यों में ज्यादातर क्षेत्र में गन्ने की सीओ-0238 प्रजाति फैली हुई है। फिलहाल इस किस्म को कुछ वर्ष तक चलाने का प्रयास है, ताकि गन्ना उत्पादन प्रभावित न हो और चीनी मिलें सुचारु रूप से चलती रहें।
ऐसे करें प्रबंधन
- चीनी मिलों को लालसड़न संक्रमित खेत को प्राथमिकता के आधार पर कटवाना चाहिए।
- खेत का निरीक्षण कर रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़कर नष्ट कर दें। यह क्रिया अप्रैल से जुलाई तक आवश्यक है। उखाड़े गए पौधों को गड्ढे में पांच से दस ग्राम कार्बेंडाजिम 50 डब्ल्यूपी पाउडर डालकर मिट्टी से ढक दें।
- फसल कटाई उपरांत रोगी व सूखे अवशेषों को जलाकर नष्ट कर दें तथा उस खेत में एक वर्ष तक गन्ने की बिजाई न करें।
- संक्रमित खेत से सिंचाई के पानी के रिसाव को रोकने के लिए खेत की मेड़बंदी अवश्य करें।
- रोग प्रभावित फसल पर 400 ग्राम थायोफिनेट मिथाईल दवाई का करीब 300 लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर दो बार प्रति एकड़ छिड़काव करें।
- खेत से जल निकास का उचित प्रबंध आवश्यक है।