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हिंदी में किए जा सकते हैं दावे, बहस से नहीं कर सकते मना

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201: अधिवक्ता दलीप चांदना।
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करनाल। न्यायिक व्यवस्था में मातृभाषा हिंदी में कामकाज को लेकर वकीलों ने लंबा संघर्ष किया। 2014 में छेड़े गए भारतीय भाषा आंदोलन का नतीजा रहा कि 11 मई 2020 को प्रदेश सरकार ने इस संबंध में अधिसूचना जारी की। इसमें कहा गया कि राज्य के सभी न्यायालयों और न्यायाधिकरणों में हिंदी का उपयोग किया जाना चाहिए। अब न्यायालयों में हिंदी में दावे किए जा सकते हैं। हिंदी में बहस से मना नहीं किया जा सकता। करनाल से इस आंदोलन के सूत्रधार बने थे अधिवक्ता दलीप कुमार चांदना। उन्हें 2014 में भारतीय भाषा आंदोलन के जिला संयोजक के रूप में दायित्व सौंपा गया था।
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भारतीय भाषा आंदोलन से पूर्व 22 सितंबर 2012 को भिवानी में ‘न्यायालय की भाषा हिंदी में करने’ विषय पर अधिवक्ताओं ने संगोष्ठी की थी। इसके बाद 2014 में भारतीय भाषा आंदोलन चलाया गया। इसके तहत चार जून 2017 को अंबाला से न्याय आग्रह यात्रा चली। प्रदेश के सभी 22 जिलों से गुजरते हुए 25 जनवरी 2017 को पंचकूला में इसका समापन हुआ। यात्रा के दौरान सभी जिलों में उपायुक्तों को प्रदेश सरकार के नाम मांग पत्र सौंपे गए। यह यात्रा पूरे देश में अभियान के राष्ट्रीय प्रमुख नवीन कौशिक के नेतृत्व में 2146 किलोमीटर चली थी।
इस शृंखला में 23 नवंबर 2016 को वकीलों ने उपायुक्त को हस्ताक्षर युक्त मांगपत्र सौंपा था। 21 फरवरी 2018 को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर वकीलों ने हस्ताक्षर अभियान चलाया। करनाल के 400 वकीलों ने हस्ताक्षर युक्त मांगपत्र उपायुक्त के माध्यम से मुख्यमंत्री को भेजा था। जिसमें पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय की कार्यभाषा के रूप में हिंदी को प्राधिकृत करने की मांग की गई।
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अधिवक्ता दलीप कुमार चांदना ने बताया कि न्यायिक व्यवस्था में अंग्रेजों द्वारा लागू की गई अंग्रेजी भाषा आजादी के बाद भी न्यायालयों में कामकाज की भाषा बनी हुई है। सरकार ने 9 नवंबर 2016 को अधिसूचना जारी की थी कि न्यायालय में निर्णय के साथ अधिकारिक आदेश हिंदी में तैयार करने शुरू किए जाएं। इस बाबत भी अभियान के तहत जिला सत्र न्यायाधीशों को ज्ञापन देते रहे हैं। हर बार न्यायिक अधिकारियों से प्रार्थना की गई कि फैसले हिंदी में देना शुरू करें ताकि दावाकर्ता को उसकी समझ में आने वाली मातृभाषा हिंदी में फैसला आए। वह उसे समझ सके। उन्होंने कहा कि सत्र न्यायालयों में पीड़ित पक्ष के प्रथम बयान अंग्रेजी में लिखे जाते हैं। वे आगे भी न्यायिक अधिकारियों से अनुरोध करते रहेंगे कि फैसले हिंदी में देना शुरू करें ताकि दावाकर्ता को समझ आने वाली भाषा में निर्णय की प्रति मिल सके।
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