करनाल। यूक्रेन में फंसे भारतीय विद्यार्थी अपने वतन लौटने की तैयारी में बैग पैक कर बैठे हैं, लेकिन उन्हें आने का विकल्प नहीं मिल रहा है। वहीं धमाकों के बीच बजते सायरन विद्यार्थियों की चिंता और बढ़ा रहे हैं। विपरीत परिस्थितियों में एंबेसी और यूनिवर्सिटी की ओर से उचित सहयोग नहीं मिलने से भी अभिभावकों में नाराजगी है। उन्होंने भारत सरकार से जल्द वहां फंसे लोगों को वापस लाने की गुहार लगाई है।
वहां हालात यह हैं कि किसी के पास खाद्य सामग्री खत्म हो गई है तो किसी के पास कैश की किल्लत है। युद्ध की स्थिति में एटीएम भी जवाब दे गए हैं। वहीं कई क्षेत्रों में बमबारी के बाद इंटरनेट व्यवस्था भी ठप हो गई है। ऐसे में बच्चों से ऑडियो या वीडियो कॉल पर बात भी नहीं हो पा रही है। कभी-कभी व्हाट्सएप मैसेज से बात होती है। इस हालात में अभिभावकों की चिंता और बढ़ गई है। इसे लेकर शनिवार को कुछ अभिभावक लघु सचिवालय भी पहुंचे, जहां उन्होंने एसडीएम गौरव कुमार को ज्ञापन सौंप कर यूक्रेन से बच्चों को जल्द वापस लाने की गुहार लगाई। अभिभावकों का आरोप है कि वहां एंबेसी और यूनिवर्सिटी भी बच्चों का साथ नहीं दे रही है। सभी को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। तीन सायरन बजते ही उन्हें बंकर में जाने के लिए कह दिया जाता है।
कहां जाएं-क्या करें, एंबेसी बच्चों को कोई रास्ता नहीं दे रही
करनाल पहुंची दिव्या का कहना है कि यूक्रेन के पूर्वी शहरों की स्थिति ज्यादा खराब है। उनके संपर्क के विद्यार्थी हॉस्टल में रुके हुए हैं। यदि बच्चों को जल्दवहां से नहीं निकाला होता तो दिक्कत बढ़ जाएगी। खाने और नकदी की दिक्कत गहरा जाएगी। एंबेसी उन्हें कहीं भी जाने की अनुमति नहीं देती। कहा जाता है यदि वे कहीं जाएंगे तो जिम्मेदारी उन्हीं की होगी। सभी ने बैग पैक किए हुए हैं। हॉस्टल वाले बच्चे बेसमेंट में चले जाते हैं लेकिन जो कमरों में हैं उन्हें सायरन बजने पर बंकर में जाना पड़ता है।
बेटे के पास सिर्फ दो दिन का बचा है खाना
राम नगर निवासी देव के पिता सुरेंद्र का कहना है कि उन्हें बेटे की चिंता है, वे फोन करके उसे वापस आने के लिए कहते थे। तब वो यही कहता था कि हालात ठीक हैं, 26 फरवरी की फ्लाइट भी बुक कराई थी। बेटे के पास खाना भी दो दिन का ही बचा है। उन्हें कहीं जाने भी नहीं देते। डेनिप्रो यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे उनके बेटे देव मदान ने बताया कि एंबेसी की ओर से भी कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। कुछ विद्यार्थी अपने आप गाड़ी बुक करके रोमानिया गए हैं। एंबेसी को भी प्रयास करने चाहिए।
फाइटर जेट की आवाज सुनकर डर जाते हैं बच्चे
राजेश खुराना का कहना है कि उनकी बेटी शिवानी खुराना वापस आ चुकी है, लेकिन वहां उसके साथियों से उसका अभी संपर्क है। बच्चों की स्थिति काफी खराब है। यूनिवर्सिटी भी कह रही है कि बच्चे अपना इंतजाम खुद करें। तीन बार सायरन बजने पर उन्हें बंकर में जाने के लिए कह दिया जाता है। हॉस्टल के पास से जब फाइटर जेट निकलते हैं तो उनकी आवाज सुनकर रात में बच्चे डर जाते हैं। खाने का संकट भी पैदा होने लगा है।
बच्चों को पोलैंड और रोमानिया बार्डर से आगे आने दे सरकार
रामनगर निवासी सुखविंद्र सिंह की बेटे कर्मजीत से वीरवार की शाम को ही बात हुई थी। इसके बाद से इंटरनेट कनेक्टिविटी न होने के कारण संपर्क नहीं हो पा रहा है। उनका कहना है कि भारत सरकार को बच्चों को वापस लाने के लिए अच्छे प्रयास करने चाहिए। जो बच्चे रोमानिया बार्डर पर पहुंचे हैं, उन्हें आगे निकलने नहीं दिया जा रहा है, जो बच्चे पोलैंड बार्डर पर हैं, उन्हें भी आने नहीं दिया जा रहा। सरकार से निवेदन है कि उनके दस्तावेज चेक करके आगे आने देना चाहिए, ताकि वे सुरक्षित हो सकें।
अभी सुरक्षित हैं मगर स्थिति तनावपूर्ण
डेनिप्रो मेडिकल यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रह रही करनाल की आकांक्षा का कहना है कि उन्हें हॉस्टल से बाहर नहीं जाने दिया जा रहा है। एंबेसी भी एक ही जवाब दे रही है। सरकार से निवेदन है कि जल्द सभी को वापस लाया जाए। स्थिति तनावपूर्ण है। हम सभी अभी तो सुरक्षित हैं लेकिन आगे के हालात का कुछ नहीं पता। किसी भी वक्त बंकर में जाने की जरूरत पड़ सकती है। पासपोर्ट सत्यापित होने के बाद सभी के पासपोर्ट वापस भी दे दिए गए हैं।