माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। गेहूं की बुवाई लगभग 90 प्रतिशत तक हो चुकी है। इसके बावजूद कई किसान ऐसे हैं जो किसी न किसी कारण से अभी बिजाई नहीं कर सके हैं। उन किसानों की फसल की पैदावार प्रभावित न हो, इसके लिए भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (आईआईडब्ल्यूबीआर) के वैज्ञानिकों ने देर और बहुत देर से बोई जाने वाली गेहूं की किस्मों की बिजाई करने की सलाह दी है। आईआईडब्ल्यूबीआर के निदेशक डॉ. रतन तिवारी का कहना है कि धान की कटाई में देरी और तापमान के उतार-चढ़ाव के बावजूद गेहूं की बिजाई तेजी के साथ हुई है। नवंबर के अंत तक गेहूं की बिजाई संतोषजनक रही है। वहीं जिन किसानों ने अभी बिजाई नहीं की है, उन्हें देर से बोई जाने वाली गेहूं की किस्मों का चयन करना चाहिए।
खास बात ये भी है कि कोई किस्म किसी भी क्षेत्र में कभी भी नहीं बोई जा सकती है, यदि ऐसा होता है तो फसल में रोग की संवेदनशीलता बढ़ सकती है। किसानों को वहीं किस्म चुननी चाहिए, जिस किस्म की जिस क्षेत्र के लिए संस्तुति की गई हैं। देर से बिजाई पर बीज की दर 125 किलो प्रति हेक्टेयर रखनी चाहिए।
देर से बोई जाने वाली गेहूं की किस्में: हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश (एनडब्ल्यूपीजेड) : इस क्षेत्र में पीबीडब्ल्यू-752, पीबीडब्ल्यू-771, डीबीडब्ल्यू-173, जेकेडब्ल्यू 261, एचडी-3059 डब्ल्यूएच-1021 आदि।
पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और झारखंड (एनईपीजेड) : डीबीडब्ल्यू-316, पीबीडब्ल्यू-833, डीबीडब्ल्यू- 107, एचडी-3118, जेकेडब्ल्यू- 261 व पीबीडब्ल्यू-752 आदि।
मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान (सीजेड): एचडी-3407, एचआई- 1634, सीजी-1029 और एमपी-3336 आदि किस्में।
ये हैं 25 के बाद बोई जाने वाली किस्में : सभी जोन के लिए : एचडी-3271, एचआई-1621 व डब्ल्यूआर-544 गेहूं की किस्में।
वैज्ञानिकों के सुझाव
पानी बचाने और लागत कम करने के लिए खेती की समय पर विवेकपूर्ण सिंचाई करनी चाहिए। गेहूं में पीलापन देख घबराएं नहीं, इसके कई कारण हो सकते हैं। यदि फसल में पीलापन हो तो उसमें नाइट्रोजन यानी यूरिया का अधिक प्रयोग नहीं करना है। अधिक कोहरा या बादल छाने की स्थिति में नाइट्रोजन के प्रयोग से बचना चाहिए। मौसम पर नजर रखें, बारिश का पूर्वानुमान हो तो सिंचाई से बचें। फसल अवशेषों को मिट्टी में ही रहने देना चाहिए या फिर मिट्टी में मिला देना चाहिए।