करनाल। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बैंक के चक्कर काट-काटकर परेशान बुजुर्ग महिला को राहत दी है। बैंक उनको एनओसी जारी नहीं कर रही थी। इससे उनकी फ्लैट की एनडीसी रुक गई थी। आयोग ने पंजाब नेशनल बैंक को निर्देश दिया किया कि वह 74 वर्षीय अमरजीत काैर को बिना किसी राशि के नो ड्यूज सर्टिफिकेट जारी करे।
आयोग के फैसले के अनुसार, मॉडल टाउन निवासी शिकायतकर्ता अमरजीत कौर ने वर्ष 2015 में हरियाणा हाउसिंग बोर्ड के ईडब्ल्यूएस फ्लैट के लिए आवेदन किया था। इसके लिए उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से 1.9 लाख रुपये का ऋण लेकर बोर्ड के पास बयाना राशि जमा की थी। वर्ष 2017 में बैंक के निर्देशानुसार, अमरजीत कौर ने फ्लैट सरेंडर करने के लिए बैंक में आवेदन दिया और ऋण पर 25,819 रुपये का ब्याज भी जमा कर दिया।
इस दौरान बैंक अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया कि अब वह बकाया राशि सीधे हाउसिंग बोर्ड से प्राप्त कर लेंगे लेकिन जब 2020 में अमरजीत कौर को दूसरे काम के लिए एनडीसी की जरूरत पड़ी तो बैंक ने यह कहते हुए मना कर दिया कि उनका ऋण खाता अभी भी बंद नहीं हुआ है, क्योंकि हाउसिंग बोर्ड ने रुपये वापस नहीं किए हैं।
शिकायतकर्ता अमरजीत कौर ने वकील सतीश अरोड़ा के माध्यम से उपभोक्ता अदालत में शिकायत दर्ज कराई। बैंक ने दलील दी कि उन्हें हाउसिंग बोर्ड से रुपये नहीं मिले हैं इसलिए ग्राहक ही ऋण चुकाने के लिए जिम्मेदार है। हाउसिंग बोर्ड का कहना था कि उन्हें सरेंडर का कोई आवेदन ही नहीं मिला।
बैंक सेवा में कमी का दोषी
आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह और सदस्यों नीरू अग्रवाल व सर्वजीत कौर ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि शिकायतकर्ता ने बैंक में सरेंडर आवेदन जमा किया था जिस पर बैंक की मोहर और हस्ताक्षर मौजूद थे। बैंक की यह जिम्मेदारी थी कि वह उस आवेदन को हाउसिंग बोर्ड को भेजकर रुपये वापस प्राप्त करता। बैंक की ओर से आवेदन आगे न भेजना सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार है।
45 दिन में हो आदेश का पालन
आयोग ने बैंक और हाउसिंग बोर्ड को आदेश दिया गया है कि वे शिकायतकर्ता से कोई भी अतिरिक्त रुपया लिए बिना उन्हें नो ड्यूज सर्टिफिकेट जारी करें। इन आदेशों का पालन 45 दिनों के भीतर लागू करना होगा। बैंक यदि चाहे तो हाउसिंग बोर्ड से अपनी ऋण राशि वसूलने के लिए स्वतंत्र है। हाउसिंग बोर्ड के खिलाफ शिकायत को खारिज कर दिया गया। यह फैसला उन उपभोक्ताओं के लिए एक मिसाल है जो बैंकों की आंतरिक कागजी कार्रवाई और आपसी तालमेल की कमी के कारण मानसिक और आर्थिक परेशानी झेलते हैं।