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एजेंडों से आगे नहीं बढ़ पाया नगर निगम के विकास कार्य

Sun, 16 Oct 2016 12:09 AM IST
सोमदत्त शर्मा/ब्यूरो/ करनाल
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करनाल शहर में विकास योजना को छोड़ यदि नगर निगम के एजेंडों पर ही काम हो जाता तो आज विकास के मामले में शहर का नक्शा ही कुछ और होता। लेकिन तीन साल में औसतन 15 मीटिंग कर 328 एजेंडे पास होने के बाद भी शहर के हालात जस के तस बने हुए हैं। निगम को बने हुए करीब तीन साल हो गए हैं। ऐसे में हर माह बैठक होनी चाहिए, लेकिन औसतन पार्षदों की बैठक हर तीसरे माह हुई है और इनमें औसतन 15 प्रस्ताव हर बैठक में रखे हैं। शुक्रवार को निगम की बैठक में पार्षदों का गुस्सा झल्लाहट में तब्दील होकर आखिरकार छलक ही गया। बैठक के बीच में जब विकास पर बातचीत हो रही थी तो पार्षद बाघ सिंह ने एजेंडा ही फाड़ दिया। उन्होंने कहा कि यह एजेंडा कागजों का पुलिंदाभर है। काम हो तो एजेंडे पास करने का फायदा भी है। पार्षद के इस व्यवहार से हालांकि निगम में हड़कंप में हैं। अन्य पार्षदों का भी एजेंडे के प्रति कुछ इसी प्रकार का रूख रहा। इधर, जब अमर उजाला ने शनिवार को निगम की कार्यप्रणाली का ग्राउंड पर रियलटी चेक किया तो पाया कि पार्षदों का गुस्सा यूं ही नहीं है। इसकी कई वजह हैं। 
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ये हैं शहर के महत्वपूर्ण पांच विकास कार्य
 एजेंडा नंबर-1 
शहर में मिनी सिटी बस चलनी थी, 12 जून, 2015 को निगम बैठक में पास हुआ था। 
क्यों? क्योंकि शहर में भीड़ भाड़ की बड़ी वजह पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन की कमी है, इसलिए यह निर्णय लिया गया था। 
यह होना चाहिए था, जो नहीं किया गया 
होना तो यह चाहिए था कि निगम के अधिकारी अपने स्तर पर ही परिवहन विभाग से गाइड लाइन लेकर बस चलाने की दिशा में काम करते। हुआ यह कि प्रस्ताव परिवहन विभाग को भेज दिया गया। वहां से इस पर कई तरह की गाइड लाइन आ गई। इसके बाद निगम ने परिवहन विभाग के साथ लंबा पत्राचार किया। अब अंत में निगम के अधिकारि यों का कहना है कि जो गाइड लाइन परिवहन विभाग की ओर से आया वह स्पष्ट नहीं है। इसे स्पष्ट कर लें इसके बाद ही बस चलने की दिशा में कुछ हो सकता है। प्रोजेक्ट के तहत शहर में छह मिनी बसें चलनी थी, इनमें से तीन एसी और तीन साधारण बसें चलनी थी। फिलहाल इस प्रोजेक्ट की गति का जवाब किसी के पास नहीं है। 

एजेंडा नंबर-2
पार्क वेल्फेयर एसोसिएशन को हैंडओवर करने थे। यह एजेंडा 3 फरवरी, 2016 को पास हुआ था। 
क्यों? क्योंकि निगम पार्कों की सही से देखभाल नहीं कर पा रहा है। वेल्फेयर एसोसिएशन इस काम को अच्छे से कर सकती थी। इसलिए यह निर्णय लिया गया था। मुद्दा पास भी हो गया था। 
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यह होना चाहिए था, जो नहीं किया गया 
 निगम की ओर से वेल्फेयर एसोसिएशन को पत्र लिखा जाना था। एमओयू साइन होना था। जानकारों का कहना है कि यह प्रक्रिया एक दिन में पूरी हो सकती थी, लेकिन निगम के अधिकारियों ने इस दिशा में कुछ काम ही नहीं किया। इस वजह से यह मामला जस का तस पड़ा है और शहर के पार्कों के हालात सभी के सामने हैं। इसके तहत सोसायटी को 3 रुपये प्रति सक्वेयर फुट के हिसाब से पैसे दिए जाने थे और छोटे पार्कों के लिए पांच हजार रुपये प्रति माह। 

एजेंडा नंबर-3
नंदी ग्राम बनना था, यह एजेंडा 3 फरवरी 2016 में पास हुआ था।
 क्यों? क्योंकि शहर में आवारा पशुओं की संख्या बढ़ रही है। इस वजह से हादसे हो रहे हैैं। पशुओं के कारण दो लोगों की मौत भी हो चुकी है, घायलों की संख्या अनगिनत है। 

यह होना चाहिए था 
नंदीग्राम का निर्माण धीमी गति से हुआ। अब नंदीग्राम बनकर तैयार है, लेकिन निगम पशुओं को वहां तक ले जाने की योजना नहीं बना पा रहा है। कभी बजट तो कभी स्टाफ की कमी बताते हुए यह प्रोजेक्ट ठंडा पड़ा है और लोगों को पशुओं को हादसों के भरोसे छोड़ दिया गया है। करीब 32 लाख रुपये की लागत से बने नंदी ग्राम को अब पशुओं का इंतजार है, लेकिन निगम के अधिकारियों के पास इसके लिए समय नहीं है। 

एजेंडा नंबर-4
निगम में आए सभी 15 गांवों में सीवर बिछना था, 3 फरवरी 2016 को पास हुआ था
क्यों? क्योंकि यह भी अब शहर का हिस्सा बन गए थे। ग्रामीण शहर की तर्ज पर टैक्स दे रहे थे। इसलिए उन्हें वह सब सुविधाएं भी दी जानी थी। 

यह होना चाहिए था 
होना यह चाहिए था कि इस काम को निगम प्रमुखता से करता। क्योंकि यह शहर के हि स्से बन गए थे। लेकिन हालात यह है कि अभी तक तो निगम इसका एस्टीमेट ही तैयार नहीं कर पाया। जबकि स्वच्छता सरकार का भी एजेंडा है। इन गांवों में एक लाख के करीब जनसंख्या रहती है। 

एजेंडा नंबर -5
शहर के सौंदर्यकरण के लिए बनने थे सात गेट .... क्यों? क्योंकि इस शहर को इतिहास से जोड़ना था। पहले भी इस शहर में सात गेट होते थे। यह गेट प्राचीन वास्तु शिल्प पर बनने थे। इससे शहर की सुंदरता बढ़े यह होना चाहिए था, जो हुआ नहीं। दो साल हो गए, इस इस पर अभी तक कुछ नहीं हुआ। होना यह चाहिए था कि निगम के अधिकारी इस काम को प्रमुखता से लेते। इस पर करीब 50 लाख रुपये ही खर्च आने थे। अभी तक न पैसे का प्रबंध हुआ न ही यह योजना बनी कि गेट बनेंगे कैसे? कुल मिलाकर यह प्रस्ताव भी पास होने पर भी ठंडे बस्ते में चला गया है। 

ये हैं दिक्कतें
क्यों नहीं निगम के प्रस्ताव यथार्थ के धरातल पर उतर पाते अमर उजाला ने जब इसकी छानबीन की तो पाया कि इसमें कई दिक्कत हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि निगम में प्रस्ताव पास होने का मतलब यह कतई नहीं कि वह काम हर हालत में होगा। क्योंकि प्रस्ताव पास होने के बाद ही यह देखा जाता है कि यह फिजिबल है या नहीं। यदि फिजिबल है तो फिर यह देखा जाता है कि इस पर कोई कानूनी अड़चन तो नहीं। यह क्लियर होने के बाद यह देखा जाता है कि इसके लिए बजट कितना चाहिए। यह पैसा आएगा कहां से? दूसरी दिक्कत यह है कि प्रस्ताव पास होने के बाद इसे अमली जामा पहनाने के लिए कोई निश्चित समय सीमा नहीं है। इस वजह से कि सी अधि कारी की जि म्मेदारी फिक्स नहीं है। इसलिए अधिकरी भी प्रस्ताव को बहुत गंभीरता से नहीं लेते। इसके अलावा एक करोड़ से ज्यादा के प्रस्ताव सरकार से अनुमति के लिए भेजे जाते हैं। 

क्या कहते हैं ईओ
नगर निगम के इओ धीरज कुमार ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि यह सही है कि प्रस्ताव जो पास हो गए उन पर काम नहीं हुआ, लेकिन इसमें कई व्यवहारिक दिक्कत हैं। उन्होंने बताया कि सभी प्रस्ताव प्रोसेस में हैं, प्रस्ताव को जमीन पर लाने में समय लगता है। इसके अलावा, स्टाफ की कमी भी कार्यों को पूरा कराने में आड़े आती है। हमारा प्रयास है कि सभी प्रोजेक्टों को जल्द पूरा किया जाए। 

हमें तो जनता को जवाब देना है, अधिकारी का क्या
पार्षद बाघ सिंह, विनोद तितोरिया व बलविंद्र सिंह ने बताया कि अधिकारी काम ही नहीं करते। हमें तो आज तक निगम की ओर से यह बताया ही नहीं गया कि प्रस्ताव पास हुआ था, उस पर संबंधित विभाग से दिक्कत आ रही है। यदि यह बताया जाए तो हम भी उस विभाग के अधिकारी से बात कर सकते हैं। पार्षदों ने कहा कि सच तो यह है कि अधिकारियों में काम टालने की आदत है। अभी भी वे इस आदत को छोड़ नहीं पा रहे हैं। क्योंकि उनकी जिम्मेदारी तय नहीं है। हमें तो जनता ने चुना है। हम शहर के मुद्दों को अच्छी तरह से जानते हैं। हमें पता है यह मुद्दा क्यों है। अधिकारी को हमारे शहर से मतलब ही क्या? 
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