अमर उजाला ब्यूरो
करनाल। नगर निगम चुनाव में मेयर पद को लेकर मतदान के बावजूद तस्वीर धुंधली है। क्रास वोटिंग और जातिवाद के खतरे के कारण इस बार चुनाव को लेकर को राजनीतिक पंडित भी समझ नहीं पा रहे हैं। सत्ताधारी पार्टी भाजपा के संगठन की किलेबंदी और सीएम का गढ़ होने के कारण भाजपा जीत के प्रति आश्वस्त जरूर है। हालांकि, वे खुद जीत का मार्जिन कम आंक रहे हैं।
उधर, विपक्षी दलों के समर्थन और जातिगत वोटों के दम पर मनोज वधवा भी जीत के लिए आशा की किरण जगाए हुए हैं। निगम के अंतर्गत आने वाले 15 गांवों में 80 प्रतिशत तक हुआ मतदान होना और शहरी क्षेत्र में मतदाताओं का कम रुझान भी राजनीतिक जानकारों को उलझा रहा है। इसके अलावा, सबसे बड़ी बात ये है कि साइलेंट वोटर किसकी तरफ गए हैं, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा है। देखना ये है कि जीत संगठन की होती है या फिर समर्थन की?
बता दें कि खुद सीएम मनोहर लाल करनाल से विधायक हैं। ऐसे में मेयर का सीधा चुनाव कराने को सभी राजनीतिक इसे लोकसभा व विधानसभा से सेमीफाइनल मान कर चल रहे हैं। यहां से सीट जीतना सीएम के लिए नाक का सवाल है, जबकि विपक्षी दल एकजुट होकर सीएम को उनके घर में ही घेरना चाहते हैं। मेयर पद को लेकर जीत लेकर जहां भाजपा का संगठन लगातार सक्रिय रहा है, साथ ही मंत्री से लेकर विधायकों को प्रचार में लगा रखा था।
वहीं, जिले के चार विधायकों ने गली गली खाक छानी है, साथ ही खुद सीएम मनोहर लाल चार दिन तक करनाल में ही डेरा डाले रहे थे। इतना ही नहीं पंजाबी समुदाय को भाजपा की तरफ लाने के लिए सीएम ने पंजाबी कार्ड तक खेला और इसका असर भी शहर में दिखा। इसके चलते पंजाबी बिरादरी भवन में समुदाय के लोगों ने भाजपा का साथ देने की बात कही। अब देखना या है कि बिरादरी के लोगों ने ईवीएम में भाजपा का कितना साथ दिया। वहीं, दूसरी ओर आशा वधवा इनेलो-बसपा और कांग्रेस के खुले समर्थन के दम पर जीत के दावे कर रही हैं। यहां भी ये बात देखने योग्य होगी कि समर्थन वोटों में कितना तब्दील हो पाया। क्योंकि कई पार्टियों को समर्थन होने के कारण बूथों पर मैनेजमेंट प्रभावित होती, साथ ही हर पार्टी के नेता खुद को मुख्य धारा में रखने की कोशिश करते हैं और ऐसे में कई बार बनते बनते समीकरण बिगड़ जाते हैं। देखना है कि वधवा इस समर्थन को कितना भूना पाए?
भाजपा के प्लस प्वाइंट : भाजपा के नेगेटिव प्लाइंट
-पार्टी का मजबूत संगठन और सत्ता। : भाजपा नेताओं द्वारा भीतर घात की आशंका।
-सिंबल पर चुनाव लड़न के कारण ईवीएम में सबसे पहला निशान होना। : चुनाव प्रचार का समय कम मिलना।
-सीएम मनोहर लाल का चार दिन ताबड़तोड़ प्रचार। : सरकार के प्रति एंटीइंकमबेंसी होना।
-रेणु बाला गुप्ता की साफ छवि व चुनाव लड़ने का तुर्जुबा। : क्रास वोटिंग का खतरा।
-लास्ट मूवमेंट में पंजाबी समुदाय का समर्थन में आना। : शहरवासियों की मुख्यमंत्री से नाराजगी।
-वोटिंग प्रतिशत कम आना, शहरी क्षेत्र में अच्छे वोट। : ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत अधिक होना।
आशा वधवा के प्लस प्वाइंस : नेगेटिव प्वाइंट
-चुनाव के लिए तैयारी काफी समय मिला। : लास्ट तक माहौल को बरकार नहीं बना पाए।
-इनेलो-बसपा और कांग्रेस का खुला समर्थन। : चुनाव से एक दिन पहले पंजाबी बिरादरी भवन में हुए कार्यक्रम में बिना बुलाए जाना और वापस आना।
-शुरू से ही चुनाव को लेकर अच्छी हवा। : इनेलो-बसपा व कांग्रेस का समर्थन मिलने के बावजूद ये नेता बूथों पर नहीं दिखे।
-पंजाबी बिरादरी का होने के कारण जातिगत समीकरण। : सीएम द्वारा खुद को पंजाबी कार्ड खेलने के कारण पंजाबी मतदाताओं का टूटना।
-भाई सोनू के निधन को लेकर शहरवासियों का इमोशनल जुड़ाव। : बैंक की 24 करोड़ रुपये की देनदारी सामने आना।
आजाद बेअंत कौर व कोमल चंदेल बिगाड़ेंगे खेल
जानकार बताते हैं कि मेयर चुनाव का पूरा खेल आजाद प्रत्याशी बेअंत कौर व लोकतंत्र सुरक्षा मंच की कोलम चंदेल की वोटों पर टिका है। जट्ट व सिख समुदाय के मतदाता जहां बेअंत कौर के साथ खड़े दिख रहे हैं तो बीसी वर्ग ने कोमल चंदेल को दिल खोल कर वोट दिए हैं। ऐसे में राजनीतिक पंडित मानते हैं कि बेअंत कौर अगर दस हजार से ज्यादा वोट लेती हैं तो आशा वधवा का नुकसान करेंगी और कोमल चंदेल बीसी वर्ग के वोटों को अपनी ले जाने में सफल होती हैं तो ये सीधा सा भाजपा को नुकसान है। देखना यह है कि ये दोनों उम्मीदवार कितने वोट हासिल कर पाते हैं। उसी के आधार पर हार और जीत तय होगी।