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लॉकडाउन ने दिया 1500 करोड़ के टर्नओवर वाली कृषि यंत्र इंडस्ट्री को बड़ा झटका

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जिले की करीब 1500 करोड़ रुपये के टर्नओवर वाली एग्रीकल्चर इंप्लीमेंट्स इंडस्ट्री (कृषि यंत्र उद्योग) को कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन ने करारा झटका दिया है। पिछले दो महीनों में यहां करीब 45 से 55 फीसदी कारोबार प्रभावित हुआ है। इसके लिए उद्यमी लॉकडाउन के कारण उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार आदि अन्य राज्यों में रिटेल काउंटर्स का बंद होना मुख्य कारण मान रहे हैं। झटके का दूसरा बड़ा कारण पिछले करीब दो महीनों में 45 से 55 फीसदी तक लोहे (स्ट्रीट प्राइसेस) के भावों में बढ़ोत्तरी है। इसके अलावा ऑक्सीजन न मिल पाना और पेट्रोलियम पदार्थों में भाव में लगातार हो रही वृद्धि ने भी कारोबार को नुकसान पहुंचाया है।
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करनाल की कृषि यंत्र इंडस्ट्री देशभर में उच्च क्वालिटी के हैरों, कल्टीवेटर, लेबनर, रोटावेटर, ट्रॉली, राजा हल, एमबी प्लाऊ, डिश प्लाऊ, डोरमेकर आदि कृषि यंत्रों का निर्माण कर आपूर्ति करती है। यहां लोहा गोविंदगढ़ (पंजाब), रायपुर (छत्तीसगढ़) व पतरासू (झारखंड) व उड़ीसा आदि की मंडी से आता है। यहां कृषि यंत्र निर्माण की करीब 150 छोटी-बड़ी इकाइयां हैं। इनका वार्षिक टर्नओवर करीब 1500 करोड़ रुपये है। पिछले साल लॉकडाउन में फैक्टरियां पूरी तरह बंद रही थीं लेकिन इस बार लॉकडाउन में फैक्टरियां जैसे-तैसे चलती रहीं लेकिन यहां से तैयार प्रोडक्ट की विभिन्न राज्यों में बिक्री नहीं हो सकी। खरीदारी में भारी गिरावट से इंडस्ट्री के पास डिमांड में करीब 50 फीसदी तक की कमी आ गई।
-गेहूं कटाई के समाप्त होते ही कृषि यंत्र बाजार में धान की तैयारियों के लिए कृषि यंत्रों की मांग बढ़ जाती है। अप्रैल, मई और जून माह में साल की सर्वाधिक डिमांड और बिक्री होती है। लेकिन लॉकडाउन में अप्रैल और मई दोनों ही महीनों ने इंडस्ट्री को बड़ा झटका दिया है। डिमांड में 50 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। लॉकडाउन अब खुलने लगा है लेकिन सीजन अब कुछ ही दिनों का बचा है। अब महंगाई इंडस्ट्री को प्रभावित कर रही है क्योंकि यह इंडस्ट्री खेती किसानी से जुड़ी होने के कारण सीधे गांवों पर निर्भर है। इस बार कोरोना महामारी का असर गांवों में अधिक दिखा। ग्रामीणों का ध्यान कृषि यंत्र खरीदने की बजाय कोरोना से जान बचाने में रहा।
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-ऑक्सीजन का प्रयोग लोहा काटने में किया जाता है। कोरोना महामारी के कारण लोगों की जान बचाने के लिए ऑक्सीजन सिलिंडर मिलना मुश्किल था तो इंडस्ट्री को कहां से मिलता। सरकार ने भी इंडस्ट्री को ऑक्सीजन की सप्लाई रोक ही दी थी। जैसे-तैसे ऑक्सीजन मिली थी तो काफी महंगी मिली। लेबर भी काफी कम रही। देश के विभिन्न राज्यों में रिटेल काउंटर नहीं खुले, जिससे डिमांड में 50 फीसदी तक की गिरावट आ गई। रॉ मैटेरियल अत्यधिक महंगा हो जाने के कारण इंडस्ट्री को बड़ा झटका लगा है। सरकार को रॉ मैटेरियल सस्ता दिलाकर इंडस्ट्री की मदद करनी चाहिए।
-रविंद्र ढ़ल, प्रधान-करनाल एग्रीकल्चर इंप्लीमेंट्स मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन।
-स्टील प्राइसेस करीब 40 से 60 फीसदी तक बढ़ गए। जो कच्चा लोहा 30 से 33 रुपये प्रति किलो आता था, वह अब 50 रुपये किलो आ रहा है। ऊपर से अन्य राज्यों की मंडियों से रॉ मैटेरियल लाने और फिनिश प्रोडक्ट को पहुंचाने में पेट्रोल डीजल की महंगाई के कारण ट्रांसपोर्ट काफी महंगा हो गया है। लेबर-ऑक्सीजन आदि कई कारणों के कारण उत्पादन लागत 45 से 55 फीसदी तक बढ़ गई। इससे तैयार प्रोडक्ट महंगा हो गया है। ऐसे में खरीदारी प्रभावित होने से इंडस्ट्री के कारोबार में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। सरकार को इंडस्ट्री को रियायतें देनी चाहिए, ताकि उत्पादन लागत कम हो सके।
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-भावुक मेहता, महासचिव-करनाल एग्रीकल्चर इंप्लीमेंट्स मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन।
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