अमर उजाला ब्यूरो
करनाल। कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कॉलेज को नई बिल्डिंग में शिफ्ट हुए डेढ़ साल बीत चुका है लेकिन अभी तक मेडिकल कॉलेज में एक भी डॉक्टर सुपर स्पेशलिस्ट नहीं है। मेडिकल कॉलेज प्रशासन का कहना है कि उन्होंने कई महीनों से चार सुपर स्पेेशलिस्ट डॉक्टरों की सेंक्शन के लिए विभाग को पत्र भेजा हुआ है लेकिन इस पत्र को भेजे हुए भी एक साल बीत गया है।
सीएम मनोहर लाल ने करनाल की जनता को कहा था कि इस मेडिकल कॉलेज में उन्हें पीजीआई जैसी सुविधाएं मिलेंगी लेकिन सबसे ज्यादा केस पीजीआई में रेफर मेडिकल कॉलेज से ही हो रहे हैं। पीजीआई जैसी सुविधा मिलेगी यह समझकर यूपी, कैथल, पानीपत सहित अन्य जिलों से मरीज मेडिकल कॉलेज में इलाज के लिए आते हैं लेकिन उन्हें यहां से रेफर कर दिया जाता है। जिले के आस-पास हर रोज तीन से चार सड़क हादसे होते हैं, इन हादसेे में लोगों को हेड इंजरी भी होती है, जिन्हें मेडिकल कॉलेज से रेफर कर दिया जाता है और अधिकतर मरीज चडीगढ़ पीजीआई पहुंचने से पहले ही बीच रास्ते दमतोड़ देते हैं। मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी में हर महीने 60 से 70 केस हेड इंजरी के केस आते हैं। इससे अलग जो ब्रेन हैमरेज व ब्रेन ट्यूमर के मरीज हैं, उन्हें प्राइवेट डाक्टर के पास लाखों रुपये में लुटना पड़ रहा है। मेडिकल कॉलेज बनने पर लोगों को उम्मीद थी की अब उन्हें प्राइवेट डाक्टरों के पास जाना नहीं पड़ेगा। प्राइवेट अस्पतालों में जो महंगा इलाज है वह उन्हें मेडिकल कॉलेज में ही मिलेगा। लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं है।
दोबारा प्राइवेट अस्पतालों में ही इलाज कराने लगे हैं मरीज
मेडिकल कॉलेज के शुरू होने पर मरीजों को उम्मीद थी कि उन्हें अब प्राइवेट अस्पताल में नहीं जाना होगा लेकिन मेडिकल कॉलेज में मरीजों को बेहतर इलाज नहीं मिल रहा और डॉक्टरों के पीछे चक्कर बहुत काटने पड़ रहे हैं। इस लिए मरीज अब दोबारा प्राइवेट अस्पतालों में ही इलाज कराने लगे हैं।
लाखों रुपये लेते हैं प्राइवेट अस्पतालों में न्यूरो सर्जन
शहर के कुछ प्राइवेट अस्पतालों में न्यूरो सर्जन है। वहां प्राइवेट डॉक्टर की फीस 300 से 400 रुपए है ओर ऑपरेशन पर कई लाख रुपये खर्च आता है। मेडिकल कॉलेज में न्यूरो सर्जन न होने के कारण मरीजों को उन प्राइवेट डाक्टरों के पास जाना पड़ रहा है, लेकिन जिन मरीजों के पास रुपये नहीं है वे चंडीगढ़ व रोहतक पीजीआई में धक्के खा रहे हैं या फिर दवा लेकर ही दर्द सहन कर रहे हैं।
जानिएं दो साल में कितने लोगों की गई जान
सन : टोटल हादसे : घायल हुए : मौत हुई
2017 : 778 : 623 : 376
2018 : 679 : 510 : 345
2012 से शुरू हुआ था मेडिकल कॉलेज
सीएम सिटी में 2012 में मेडिकल कॉलेज शुरू हो गया था, पहले मेडिकल कॉलेज सरकारी अस्पताल की बिल्डिंग में ही चल रहा था, इसके बाद सरकार द्वारा 642 करोड़ रुपए की लागत से मेडिकल कॉलेज की नई बिल्डिंग बनाई गई। लोगों को उम्मीद थी की मेडिकल कॉलेज में ही हर बीमारी का इलाज होगा, उन्हें चंड़ीगढ़ व रोहतक नहीं जाना पड़ेगा, लेकिन न्यूरो सर्जन न होने के कारण लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
चार सुपर स्पेशलिस्ट की भेजी हुई है सेेंक्शन
मेडिकल कॉलेज में अभी सुपर स्पेशलिस्ट नहीं है। न्यूरो सर्जन, न्यूरोलोजिस्ट, कार्डियोग्राफी व प्लाटिक सर्जन के लिए हेड ऑफिस में 2017 में पत्र लिखा था। अभी सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर की सेंक्शन नहीं मिली है। हेड इंजरी के जो मरीज आते हैं, उन्हें जनरल सर्जन देखते हैं और दो प्राइवेट न्यूरो सर्जन डॉक्टर भी हायर किए हुए हैं। -डॉ. मुनीष पुरूथी, डीएमएस कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कॉलेज, करनाल।