कैथल में कांग्रेस और भाजपा के बीच जोरदार मुकाबला
डॉ. श्याम सिंह
कैथल। हरियाणा का कैथल राजनीतिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि यहीं पर महाभारत का युद्ध लड़ा गया था। अबकी विधानसभा चुनाव में भी यहां की चारों सीटों पर राजनीतिक विश्लेषकों की निगाह लगी हुई है।
कैथल विधानसभा में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच माना जा रहा है। आप के सतबीर गोयत भी जीत के दावे कर रहे हैं। जजपा के संदीप गढ़ी और इनेलो-बसपा गठबंधन से अनिल तंवर मैदान में ताल ठोंक रहे हैं।
कैथल जिले की चार विधानसभा सीटों में आठ लाख 24 हजार 408 वोटर हैं। इनमें से कैथल में दो लाख 20 हजार 459 मतदाता हैं। इनमें से एक हजार 15 हजार 566 पुरुष और एक लाख चार हजार 892 महिला मतदाता हैं। एक थर्ड जेंडर मतदाता हैं। लोगों के मुताबिक, मुख्य मुकाबला भाजपा के निवर्तमान विधायक लीलाराम और कांग्रेस के आदित्य सुरजेवाला के बीच माना जा रहा है।
आदित्य कांग्रेस सांसद रणदीप सुरजेवाला के बेटे हैं और परिवार की तीसरी पीढ़ी के तौर पर यहां से चुनाव लड़ रहे हैं। साफ है कि इस प्रतिष्ठा की लड़ाई में उन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। इस बीच लीलाराम और सुरजेवाला के बीच काफी बयानबाजी चर्चा में भी रही है।
सुरजेवाला जाट समाज तो लीला राम नॉन जाट कैटेगिरी से आते हैं। ऐसे में कैथल विधानसभा क्षेत्र में जाट और नॉन जाट की लड़ाई दिख रही है। कैथल में शहर का ड्रीम प्रोजेक्ट सिटी स्क्वायर का निर्माण न होना और पार्किंग पर काम न होना बड़ी
समस्या है। वर्ष 2014 में इन दोनों ही परियोजनाओं पर काम शुरू किया गया था, लेकिन 10 साल के बाद भी यह पूरा नहीं हो पाया है।
पूंडरी के इतिहास ने उलझाए राजनीतिक अनुमान
पूंडरी। हरियाणा में निर्दलियों की राजधानी कही जाने वाली पूंडरी विधानसभा में अबकी चुनावों में किसके सिर जीत का सेहरा बंधेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। दरअसल, हलके में तीनों मुख्य बिरादरियों रोड़, जाट और ब्राह्मण समाज के उम्मीदवारों के चुनाव मैदान में उतरने से यहां का राजनीतिक माहौल काफी गर्म भले दिख रहा है लेकिन ज्यादातर लोगों में अपने क्षेत्र और जाति के उम्मीदवारों के प्रति नजर आ रहे प्रेम से राजनीतिक समीकरण काफी उलझे नजर आ रहे हैं।
यहां पर ज्यादातर का कहना है कि इस बार भी निर्दलीय ही चुनाव जीतेगा। पिछले तीन चुनावों का इतिहास भी यही बताता है। यहां का रनर विजेता बनता रहा है। आजाद उम्मीदवारों में पिछले चुनाव में नंबर दो पर रहे सतबीर भाणा रहे थे। तब भाणा कांग्रेस से थे।
वहीं कांग्रेस से विद्रोह कर आजाद उम्मीदवार के तौर पर नामांकन पत्र भरने वाली सुनीता बतान और निवर्तमान विधायक रणधीर सिंह गोलन के कांग्रेस में शामिल होने के बाद राजनीतिक समीकरण रोचक बन गए हैं। गोलन और सुनीता अब मैदान से बाहर हो चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस के टिकट पर लड़ रहे पूर्व विधायक सुल्तान सिंह जड़ौला को लाभ मिल सकता है। सुल्तान सिंह 2009 में निर्दलीय जीते थे लेकिन इसके बाद वह राजनीतिक पटल से दूर हो गए थे वहीं सतबीर भाणा लगातार राजनीति में सक्रिय रहे लेकिन कांग्रेस ने अबकी उन्हें किनारे कर दिया। कुल मिलाकर राजनीतिक दलों की बेरुखी से यहां आजाद उम्मीदवारों की बाढ़ दिख रही है।
दूसरी ओर 2005 और 2014 में बतौर आजाद उम्मीदवार चुनाव जीतने वाले ब्राह्मण वर्ग के दिनेश कौशिक भी इस बार फिर से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। इससे पहले वह जीत के बाद भाजपा में शामिल हो गए थे लेकिन भाजपा ने उन्हें अपना टिकट नहीं दिया। इस सीट पर जीत के लिए तरस रही भाजपा ने सतपाल जांबा पर दांव खेला हैं। वह समाजसेवा से चर्चित नए चेहरे हैं।
इसी प्रकार 1996 में कांग्रेस उम्मीदवार ईश्वर सिंह को हराकर यहां पर बतौर आजाद उम्मीदवार की जीत से आगाज करने वाले नरेंद्र शर्मा अबकी आम आदमी पार्टी से उम्मीदवार हैं। आंकड़ों की बात करें तो यहां ज्यादातर रोड़ और ब्राह्मण समाज के लोग ही विधायक बने हैं। यहां हुए 12 चुनावों में आजाद उम्मीदवारों ने सर्वाधिक छह बार और कांग्रेस ने चार बार जीत दर्ज की ही वहीं भाजपा यहां जीत के लिए तरस रही है। यहां जनता पार्टी और लोकदल उम्मीदवार एक-एक बार जीते हैंं।
गुहला में बिगड़ सकता है सियासी गणित
गुहला। गुहला विधानसभा क्षेत्र के चुनाव मैदान में किस्मत आजमा रहे सभी प्रत्याशियों ने अपने अपने प्रचार के लिए पूरी ताकत झोंक दी। कांग्रेस से बागी हुए आजाद उम्मीदवार नरेश ढांडे भाजपा-कांग्रेस के समीकरण बिगाड़ सकते हैं।
यहां कांग्रेस ने देवेंद्र हंस पर भरोसा किया है वहीं भाजपा के टिकट पर कुलवंत बाजीगर चुनाव लड़ रहे हैं। जजपा से कृष्ण बाजीगर मैदान में हैं। आप के राकेश खानपुर और इनेलो-बसपा गठबंधन से पूनम सुल्तानिया चुनाव मैदान में प्रचार के दौरान अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं।
गौरतलब है कि यहां जब चुनाव की घोषणा हुई थी तो आरक्षित सीट गुहला से मुख्य रूप से भाजपा के कुलवंत बाजीगर व कांग्रेस के देवेंद्र हंस के बीच ही मुकाबला माना जा रहा था। लोगों का कहना था कि इन्हीं दो पार्टियों के बीच हार-जीत का फैसला होगा, लेकिन कांग्रेस की टिकट न मिलने के बाद बागी हुए नरेश ढांडे ने आजाद प्रत्याशी के रूप में किस्मत आजमाने का फैसला किया। इसके बाद यहां पर मुकाबला रोमांचक बन गया है।
उल्लेखनीय है कि पंजाब से सटे हल्का गुहला के विधानसभा क्षेत्र में आजाद चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के दूसरी बार चुनाव लड़ने पर विधायक बनने का इतिहास बना है। यह परंपरा 2009 से शुरू हुई थी, जो 2019 तक जारी रही। इस बार वर्ष 2019 में आजाद चुनाव लड़े देवेंद्र हंस को कांग्रेस ने टिकट दिया है।
इससे पहले वर्ष 2009 में कुलवंत बाजीगर निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़े। इसके बाद वे 2014 में विधायक बने। इसी प्रकार से जजपा के निवर्तमान विधायक ईश्वर सिंह की पुत्रवधु रेखा रानी ने वर्ष 2014 में निर्दलीय चुनाव लड़ा था। इसके बाद उनके ससुर ईश्वर सिंह चुनाव लड़कर जीते थे। अबकी चुनाव में क्या माहौल रहेगा, देखना दिलचस्प होगा।
कलायत में हावी दिख रहे जातीय समीकरण
कलायत। कलायत विधानसभा क्षेत्र में इस बार अंतिम समय तक चुनावी स्थिति स्पष्ट नहीं है। हालांकि यहां पर जातीय समीकरण ज्यादा हावी नजर आ रहे हैं। सभी पार्टियों के प्रत्याशियों के साथ निर्दलीय प्रत्याशी भी पूरी दौड़ में बने हैं।
कांग्रेस के सामने यहां 15 साल का सूखा है। पार्टी उम्मीदवार विकास के सामने बागी अनिता ढुल मोर्चा खोले हैं। वहीं भाजपा की कमलेश ढांडा की राह भी कंटीली दिख रही है। आप से यहां अनुराग ढांडा और इनेलो-बसपा के रामपाल माजरा मजबूत दावेदारी पेश कर रहे हैं। इस हिसाब से पंचकोणीय स्थिति यहां है।
मुकाबले में बने उम्मीदवारों में से पांच प्रत्याशी जाट समाज से हैं, एक राजपूत व एक ब्राह्मण समाज से हैं। ढुल, ढांडा, सहारण, राजपूत, ब्राह्मण जैसे जातीय समीकरण में बंट गया। ऐसे में वोटों का ध्रुवीकरण होने के कारण स्थिति पूरी तरह से असमंजस की बनी है। कुल मिला कर इस समय जो स्थिति बनी है, उसके अनुसार ओबीसी वोट जो भी अधिक संख्या में ले गया वही बाजी मार सकता है।