खेतों में लहराती हुई सरसों की फसल।
राजौंद। नहरी पानी की कमी व भूमिगत जल का गहरा होना व पानी सिंचाई योग्य न होने से क्षेत्र के किसान अपनी पारंपरिक फसलों की और लौटने लगे हैं। इस क्षेत्र का किसान कई वर्ष पहले सरसों, चना, तारा-मीरा, जौ व चना एवं गेहूं मिलाकर बेरड़ा इत्यादि की फसलें उगाते थे। नकदी फसलों के चक्कर में फंस कर यहां का किसान भी गेहूं व धान के मोह से नहीं बच सका, जिसका परिणाम किसान के सामने नहरी पानी की भारी कमी एवं भूमिगत जल स्तर दिनों दिन नीचे गिरता चला गया।
किसान अपनी फसलों की सिंचाई के लिए भारी भरकम खर्चों की चपेट में आता चला गया, लेकिन फिर भी फसलों की औसत पैदावार में भारी गिरावट लगातार जारी रहने से किसान को अपनी प्राचीन एवं बरानी फसलों की और लोटने को विवश हो गया। क्षेत्र का किसान आज धान, गेहूं की फसल को छोड़कर धीरे-2 सरसों व दाल आदि की फसलों की तरफ लौटने लगा है, जिसके चलते क्षेत्र के गांवों में अनेकों स्थानों पर हरि भरी सरसों के पीले फूलों से लदे खेत दिखाई देते हैं। किसानों में रामपाल, महेंद्र सिंह आदि ने बताया कि प्राचीन काल में किसान सरसों व चना, जौ इत्यादि की फसलों को उगाता था, जो बहुत कम खर्चीली होती थी तथा इन फसलों से होने वाली आमदनी भी किसान के लिए वरदान साबित होती थी तथा सिंचाई की भी ज्यादा आवश्यकता इन फसलों को नहीं होती थी।