संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। सत्संग की पहली सीढ़ी सेवा है तो दूसरी सीढ़ी प्रेम है। पहली दो सीढियां चढ़ने वाला ही सतगुरु के भाने हुक्म और मौज को समझ पाता है। जिस प्रेमी को सत्संग से प्रेम होता है वो सत्संग लाभ के लिए सारी दुख तकलीफों को भूल जाता है। सत्संग का पूर्ण लाभ और आनंद भी प्रत्यक्ष दर्शन से ही होता है। यह सत्संग वचन परम संत सतगुरु कंवर महाराज ने कैथल के राधा स्वामी आश्रम में साध संगत को फरमाए। हुजूर कंवर ने फरमाया कि जो जीव अपने चोले की सार्थकता को समझ जाता है वही सत्संग की रमज को समझ पाता है। सत्संग को समझने के लिए हमें अपना सामाजिक जीवन सुधारना होगा।
आज हमारा सामाजिक दर्शन ही बिगड़ा हुआ है। न बच्चे मां बाप की परवाह करते हैं न मां बाप बच्चों की नैतिक परवरिश करते हैं। आज युवा नशे की जकड़ में हैं। काम, क्रोध का बोलबाला है। ऐसे में भक्ति में हमारा मन कैसे लगेगा। इसलिए यह आवश्यक है कि पहले हम मानसिक शांति को बनाए ताकि हमारा जगत और अगत सही बने। गुरु महाराज ने कहा कि नाम न तो खंड ब्रह्माण्ड को तार दिया फिर हम क्यों नहीं तिरेंगे। कारण केवल एक है कि हमने नाम की न महता को समझा न इसके मर्म को जाना। नाम संतोष शांति परोपकार का बीज बोता है। अगर नाम लेकर भी आपकी भटकन नहीं मिटी तो समझो कि आप स्वयं के साथ ठगी कर रहे हैं।
संत सतगुरु से नाम लेकर भी यदि आपके भरम नहीं मिटे तो मान लेना कि आपकी शरणागति में ही दोष है। उन्होंने कहा कि महापुरुषों की बानी तो जीव के लिए हर लिहाज से कल्याणकारी है। अगर नाम लेकर नाम की कमाई ही नहीं करोगे तो लाभ कैसे पाओगे। दुनियादारी और संतमत एक-दूसरे के विपरीत है। दुनियादारी में तो जितने आपके ओहदे बढ़ेंगे उतना ही आपका कद बढ़ेगा, लेकिन संतों की शरणाई में जितना आप नीचे रहोगे उतना आपका कद बढ़ेगा।