संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। देश को 15 अगस्त 1947 को आजादी तो मिल गई थी। आजादी के जश्न के बीच हिंदुस्तान का बंटवारा लोगों को खल रहा था। बंटवारे के बाद पाकिस्तान से निकलना बड़ी चुनौती थी। यह कहना है आरकेएसडी कॉलेज के अंग्रेजी के पूर्व प्रोफेसर व साहित्यकार प्रो. अमृत लाल मदान का।
उन्होंने आजादी के समय की यादें साझा करते हुए बताया कि जिस समय देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ तो उनकी आयु महज सात साल की थी। पाकिस्तान से भारत आ रहे लोगों पर काफी अत्याचार किया जा रहा था। हिंदुओं में भारत पहुंचने की होड़ लगी थी। इन लोगों में वह भी अपने परिवार के सदस्यों के साथ शामिल थे।
जो लोग बंटवारे के बाद पाकिस्तान से भारत आना चाहते थे। वे लगातार मारपीट के बीच अपनी जान जोखिम में डालकर भारत की तरफ आगे बढ़ रहे थे। पाकिस्तान से भारत आना से खाली नहीं था। प्रो. मदान ने बताया कि वे पाकिस्तान के जिला डेरा गाजी खां से भारत में वापस आ रहे थे। उसी समय वहां के कुछ लोग उन्हें लूट के इरादे से रोकना चाहते थे।
उस समय एक दरगाह के मौलवी उनके बचाव के में सामने आए। उन्होंने उन लोगों को वहां से भगा दिया। वहां के लोग मौलवियों के धर्म गुरु होने के नाते उनकी बातें मानते हैं। मदान बताते हैं कि भारत देश आजादी तक भी हिंदुस्तान था। अंग्रेजों ने दोनों देशों के लोगों में नफरत की भावना पैदा की थी।
आजादी से तीन दिन पहले ही वहां पर एक जुलूस निकल रहा था। उस दौरान वे अपने चाचा के साथ थे। वहां पर लोगबनके रहेगा पाकिस्तान के नारे लगा रहे थे। उनके इन नारों के जवाब में हिंदुस्तान के लोग नहीं बनेगा पाकिस्तान के नारे लगा रहे थे। इससे लोगों में तनाव बन गया था। भगदड़ मच गई थी। उनके चाचा उन्हें लेकर वहां से तुरंत भाग निकले।