कैथल। सावन — वह महीना जो कभी उल्लास, रंगों और रिश्तों की भीनी फुहारों से भरा रहता था, अब समय के साथ अपनी पुरानी खुशबू और आत्मीयता खोता जा रहा है। जिन सावनी झूलों पर बचपन झूमा करता था, वो अब सिर्फ तस्वीरों और स्मृतियों में सजे दिखाई देते हैं।
सावन की बात आते ही ज़ेहन में उभरते हैं — पेड़ों पर लटकते झूले, हथेलियों पर रची मेंहदी, पारंपरिक पोशाकों में सजी महिलाएं, लोकगीतों की स्वर-लहरियां, और रिमझिम बारिश में भीगते मुस्कराते चेहरे। कभी यह महीना धार्मिक भावना के साथ-साथ सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक हुआ करता था।
एक समय था जब बहनों को भाई ‘’कोथली’’ भेजा करते थे — मिठाई, चूड़ियां, कपड़े और स्नेह से भरे उपहारों के साथ। यह कोथली केवल एक सौगात नहीं, रिश्तों की मिठास और भावनात्मक जुड़ाव की अभिव्यक्ति हुआ करती थी। मोहल्लों में लड़कियों का झूला झूलते हुए सावनी गीत गाना, घरों में पारंपरिक पकवानों की खुशबू, ये सब सावन की आत्मा थे।
लेकिन अब सब कुछ बदल रहा है। कोथली भेजने की परंपरा सिमट गई है, भाई-बहनों के बीच की आत्मीयता अब डिजिटल ट्रांजैक्शन और ऑनलाइन गिफ्ट्स तक सीमित होती जा रही है। भाई कहते हैं—”पैसे भेज दिए हैं, कुछ पसंद हो तो ले लेना।”
व्यस्त दिनचर्या और तकनीकी निर्भरता ने परंपराओं की जगह सुविधा को दे दी है। रिश्तों में वो अपनापन, वो ठहराव अब मोबाइल की स्क्रीन पर सूचनाओं में तब्दील हो गया है। अब ज़रूरत है कि हम ठहरें, सोचें और अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजें। आने वाली पीढ़ी को सिर्फ त्योहारों की तारीख़ें नहीं, उनका असली रंग, रस और रिश्तों का भाव भी समझाना होगा।
-प्रस्तुति: ऊषा चौधरी, सीवन (कैथल)