गुहला चीका। लो आ गई लोहड़ी वे... बना लो जोड़ी वे...”- इन्हीं लोकगीतों की गूंज के साथ नए विवाहित जोड़े अपनी पहली लोहड़ी पूरे उल्लास और परंपरा के साथ मनाते हैं। लोहड़ी पर्व अब केवल पंजाब तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे देश में उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाने लगा है। भले ही समय के साथ इसे मनाने के तरीके बदले हों, लेकिन इसके पीछे की भावना आज भी वही है—खुशियां बांटना और रिश्तों को मजबूती देना।
लोहड़ी के दिन हर गली, मोहल्ले और कॉलोनी में महिलाएं लोकगीत गाते हुए लोहड़ी मांगती दिखाई देती हैं। “दुल्ला भट्टी वाला...” जैसे गीतों के पीछे भी एक सशक्त लोककथा छिपी है, जो सामाजिक साहस और मानवीय मूल्यों की याद दिलाती है। ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा माहौल को और रंगीन बना देते हैं।
यह पर्व उन परिवारों के लिए विशेष महत्व रखता है, जिनके यहां बेटे की शादी हुई हो या घर में बेटे का जन्म हुआ हो। इस अवसर पर रिश्तेदार और मित्र एकत्र होकर लोहड़ी मनाते हैं। अग्नि में मूंगफली, रेवड़ी, मक्के के दाने अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। नई बहू और नवजात शिशु को उपहार भेंट किए जाते हैं।
“सुंदर मुंदरिये हो, तेरा कौन विचारा हो...”, “डब्बा भराया लीरा दा...”, “मकई दा दाना अन्न लेके जाना...” जैसे गीतों पर युवा जब भांगड़ा और गिद्दा करते हैं, तो हर उम्र के लोग मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। इन गीतों के माध्यम से 15वीं सदी में पंजाबी बेटियों को अमीर लुटेरों से मुक्त कराने वाले दुल्ला भट्टी के संघर्ष की गाथा भी जीवंत होती है।
बेटों की पहली लोहड़ी का उत्साह
गांव थेह बनेंडा निवासी शमशेर उर्फ फौजी अपने बेटों रेयांश वर्तिया और दिवांश वर्तिया की पहली लोहड़ी को लेकर खासे उत्साहित हैं। इस अवसर पर सभी रिश्तेदारों और मित्रों को निमंत्रण पत्र भेजे जा चुके हैं। घर की सजावट शुरू हो चुकी है और परिवार के सभी सदस्यों के नए कपड़े भी तैयार हैं। इस बार दोनों बेटे ही लोहड़ी पूजन करेंगे और सभी शुभ कार्य उन्हीं के हाथों से संपन्न होंगे।
खुशियों का आगमन
भारतीय किसान यूनियन चढ़ूनी के जिला आईटी सेल प्रभारी जरनैल सिंह जैली के घर पोते जोरावर सिंह के जन्म के बाद पहली लोहड़ी आई है। पूरे परिवार के लिए यह अवसर बेहद खास है। तय किया गया है कि इस बार की लोहड़ी परंपरागत होने के साथ-साथ पोते जोरावर सिंह के नाम समर्पित होगी। भाकियू नेता की बहू के लिए यह ससुराल में पहली लोहड़ी है, जो परिवार में उनके सम्मान और अपनत्व का प्रतीक बनी। लोहड़ी के दिन अखंड पाठ साहिब का भोग लगेगा। रिश्तेदारों व मित्रों को इसमें शामिल होने का निमंत्रण दिया गया है।
उस जमाने की लोहड़ी बेहद अलग थी
शक्ति नगर चीका निवासी 60 वर्षीय गीता रानी अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहती हैं कि तब और अब की लोहड़ी में जमीन-आसमान का फर्क है। पहले घूंघट में लोहड़ी मनाई जाती थी, जबकि अब वेस्टर्न लुक का चलन बढ़ गया है। पहले तैयारियां 20–25 दिन पहले शुरू हो जाती थीं और पंजाबी परिवार सीमित संख्या में ही एकत्र हो पाते थे।
...ताकि प्यार रहे बरकरार
डीएवी कॉलेज चीका के इतिहासकार डॉ. राजेंद्र सिंह का कहना है कि आज लोगों में धैर्य की कमी दिखती है। छोटे-छोटे मुद्दे बहस का कारण बन रहे हैं। मायका हो या ससुराल, बड़ों की बातों को नजरअंदाज किया जा रहा है। एक साथ बैठकर भोजन करने की परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है, जबकि उसी भोजन की मेज पर बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान निकल जाया करता था। लोहड़ी भी इसी सामूहिकता का प्रतीक है। मिल कर खुशियां बांटेंगे तो प्यार अपने आप बढ़ेगा।
जरनैल सिंह जैली के पोते जोरावर सिंह।
जरनैल सिंह जैली के पोते जोरावर सिंह।
जरनैल सिंह जैली के पोते जोरावर सिंह।