संवाद न्यूज एजेंसी
कलायत। प्रकृति की गोद में स्थित पौराणिक स्वयंभू शिव मंदिर खंडालवा में महाशिवरात्रि पर्व को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं। सावन माह के आरंभ के साथ ही मंदिर परिसर में भोलेनाथ का चंदन, पुष्प व आभूषणों से किया गया श्रृंगार श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है।
पांच हजार वर्ष पुराना स्वयंभू शिवलिंग ः महंत रघुनाथ गिरि ने जानकारी दी कि खंडालवा गांव (बेजान, निर्जन) में स्थित यह प्राचीन शिवलिंग करीब पांच हजार वर्ष पुराना है, जिसे पाताल लोक से प्रकट माना जाता है। इसी कारण शिवशंभू को यहां पातालेश्वर और खटवांगेश्वर के नाम से जाना जाता है। मंदिर एक विशाल टीले पर बना है और इसके बावजूद गांव में आज कोई आबादी नहीं है, फिर भी मंदिर की धार्मिक महिमा दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।
पंडित विशाल शांडिल्य ने बताया कि सावन माह भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इस माह की शिवरात्रि तिथि का महत्व महाशिवरात्रि के समान होता है। सावन में प्रत्येक दिन शिववास होता है, अतः यह माह रुद्राभिषेक व शिव पूजन के लिए सर्वोत्तम माना गया है। उन्होंने कहा कि सावन के अतिरिक्त अन्य महीनों में रुद्राभिषेक के लिए शिववास की गणना करनी पड़ती है, लेकिन इस माह प्रतिदिन यह संभव होता है। सावन शिवरात्रि के दिन रुद्राभिषेक करने से मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।
मान्यताएं और खटवांग की भक्ति
माना जाता है कि इस स्थान का संबंध भगवान राम के इक्ष्वाकु वंश से है। प्रबंध समिति प्रधान मास्टर बलबीर मटौर ने बताया कि राजा खटवांग ने राज-पाट त्यागकर यहीं शिव आराधना की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए थे। राजा खटवांग ने शिव से हर जन्म में प्रभुभक्ति की कामना की, और तभी से वे ‘’खटवांग’’ के नाम से विख्यात हुए।
151 फुट ऊंचा मंदिर, अद्वितीय वास्तुशिल्प
महंत रघुनाथ गिरि के अनुसार मंदिर की कुल ऊंचाई 151 फीट है, जिसमें 30 फीट भूमि के भीतर, 110 फीट मंदिर का मुख्य ढांचा और 11 फीट का कलश शामिल है।
कैसे पहुंच सकते हैं ः यह मंदिर कलायत से 7 किलोमीटर और कैथल से 33 किलोमीटर दूर खंडालवा में स्थित है। कलायत तक बस से पहुंचा जा सकता है, और फिर ऑटो रिक्शा से मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। निकटतम रेलवे स्टेशन कलायत है।