संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। जिले में ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्व के पर्यटन केंद्रों के रूप में विकसित करने की योजनाएं अधूरी पड़ी हैं। कई तीर्थ स्थलों का विकास कार्य शुरू तो हुआ लेकिन आज तक पूरा नहीं हो सका। शहर में भाई उदय सिंह किला, पुराने अस्पताल के पास बनी प्राचीन बावड़ी और हिंदुस्तान की पहली जांबाज मुस्लिम शासिका रजिया बेगम सुल्ताना का मकबरा इस समय जीर्णोद्धार की बाट जोह रहा है। आइए जानते हैं इन तीनों ऐतिहासिक स्थलाें के महत्व के बारे में।
शहर में कोठी गेट के पास स्थित भाई उदय सिंह के किले का जिले के ऐतिहासिक स्थलों में महत्वपूर्ण स्थान है। यह किला जहां कैथल के पर्यटन स्थलों में मुख्य है। वहीं, जिले की प्राचीन धरोहर के रूप में भी जाना जाता है।
आज भी समय-समय पर किला परिसर में सांस्कृतिक, धार्मिक व राजनीतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। किले के एक ओर नगर परिषद का कार्यालय और दूसरी तरफ विद्क्यार झील होने के कारण शाम के समय यहां सैर करने के लिए आने वाले शहरवासियों की भीड़ रहती है।
प्रमुख इतिहासकार कमलेश शर्मा बताते हैं कि किले का निर्माण दिल्ली सल्तनत के कार्यकाल में सेना के लिए किया गया था। किले का निर्माण 1570 में हुआ था। बाद में यह भाई शासकों के अधीन आ गया।
वर्ष 1747 में सिखों ने किले को अपने अधीन ले लिया। सिख शासक देसू सिंह ने इस कैथल को अपनी राजधानी के रूप में विकसित किया था। उनके बाद उसके बेटे लाल सिंह ने किले की देखरेख की। उनके पोते भाई उदय सिंह के पास कोई संतान नहीं थी।
वर्ष 1823 में उन्होंने राजकाज संभाला इसके बाद उनकी 1843 में मृत्यु हो गई। बाद में अंग्रेजी सरकार ने किले का अपने अधीन कर लिया। करीब 12 वर्ष पहले किले के जीर्णोद्धार के लिए कार्य करवाया गया था।
उस समय शुरू किए गए कार्य को अभी तक पूरा नहीं किया गया है। आधे से ज्यादा कार्य अब भी अधूरा पड़ा हुआ है। किले के सुंदरीकरण पर एक बड़ी राशि खर्च की जा चुकी है, लेकिन अभी और ज्यादा सुधार की जरूरत है। बाहर से देखने में तो किला आकर्षक है लेकिन इसके अंदर जाने के सभी रास्ते इस समय बंद पड़े हैं।
मुगलकालीन इतिहास समेटे है प्राचीन बावड़ी
शहर में पुराने अस्पताल के पास बनी प्राचीन बावड़ी मुगलकालीन इतिहास समेटे हुए है। प्राचीन होने के साथ-साथ इसे कैथल के मुख्य पर्यटन स्थलों के रूप में देखा जाता है। शहर के बुजुर्गों का कहना है कि कोठी गेट के पास बने भाई उदय सिंह के किले से कैथल की महारानी महताब कौर इस बावड़ी में स्नान करने के लिए आती थी जबकि इतिहासकारों का कहना है कि यह बावड़ी दिल्ली सल्तनत के समय बनाई गई थी। उस समय यह जल संग्रहण करने का प्रमुख स्रोत थी।
बावड़ी में सैनिकों के लिए जल का संग्रहण किया जाता था, ताकि युद्ध व अन्य परिस्थितियों में राज्य में पानी की कमी न रहे। इसका निर्माण कैथल राज्य के भाई शासकों द्वारा सन 1767 से 1843 के मध्य करवाया गया था। निर्माण के समय यह पानी का एक बहुत बड़ा टैंक था। तीन मंजिल में गहराई तक इसे चूना, सुरखी और लाखौरी ईंटों से बनाया गया है। इस आकार स्टेपवेल में हैं, जिसमें अंदर जाने के लिए सीढ़ियां दी गई हैं।
इसे गुंबद के आकार में बनी छत से ढका गया है और अंदर जाने के लिए बनाई गई सीढ़ियों के दोनों तरफ मोटी-मोटी पुरानी ईंटों की दीवारें बनाई गई हैं। अंदर जाने के लिए अस्पताल के मुख्य गेट के साथ ही इसका गेट बनाया गया है। इसके अलावा दीवारों पर भी ईंटों को काटकर कलाकारी की गई है। इतिहासकार कमलेश शर्मा ने बताया कि अंग्रेजों के शासनकाल में भी जिले के लोगों ने बावड़ी का पूरा प्रयोग किया और लाभ उठाया। आज भी सरकार और जिला प्रशासन को इन स्थलों की देखरेख के प्रबंध करने की जरूरत है।
झाड़ियों में घिरा दिखता है रजिया बेगम का मकबरा
मानस रोड पर स्थित अल्तमश की बेटी और हिंदुस्तान की पहली जांबाज मुस्लिम शासिका रजिया बेगम सुल्ताना का मकबरा इस समय जीर्ण-शीर्ण अवस्था में झाड़ियों में घिरा दिखाई देता है। इसके सामने कुछ दूरी पर एक ओर ढांचा है। इन दोनों ढांचों के बीच मुख्य सड़क की तरफ एक पुराना कुआं दिखाई देता है। इस समय इस जर्जर दिखने वाले मकबरे के ढांचे के पीछे की तरफ नीचे मिट्टी से पूरी तरह अटा पड़ा एक द्वार दिखाई देता है, जिसकी सफाई करने के बाद इसमें से किसी दूसरे भवन को जोड़ने वाला जमीन के नीचे का रास्ता निकलना संभवत: दिखाई देगा।
कमलेश शर्मा ने बताया कि शुरुआती दौर में जिला योजना के तहत छह लाख रुपये की धनराशि से रजिया बेगम उद्यान को विकसित किया जाना है। इसके बन जाने के बाद अन्य ऐतिहासिक स्थलों के साथ-साथ सैलानी इसे देखने भी आएंगे। यह मकबरा इतिहासकारों के आकर्षण का केंद्र है। इतिहास में मिले उल्लेखों के अुनसार, रजिया बेगम के पति और उस वक्त बठिंडा के गवर्नर अल्तुनिया ने सेना का गठन करके दिल्ली की ओर आक्रमण के लिए कूच की थी और दुर्भाग्य से उसे शिकस्त हुई थी।
कैथल में ही रजिया, सुल्तान और दिल्ली के शासक बहरामशाह की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ था तथा 13 नवंबर 1240 ई. को रजिया सुल्तान व उनके पति अल्तुनिया को उसकी ही सेना ने बगावत करके इसी स्थान पर मौत के घाट उतार दिया था। परंपरा के अनुसार रजिया को इसी स्थान पर दफना दिया गया था।