संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। पट्टी अफगान स्थित गुरु गोबिंद सिंह खेल स्टेडियम बदहाली का शिकार हो गया है। हैरानी की बात यह है कि विभाग ने लंबे समय से इसकी कोई सुध नहीं ली। बारिश के मौसम में मैदान के चारों तरफ कांग्रेस घास उग आई है, जिससे यहां जहरीले कीड़े और सांपों के आने का खतरा बना हुआ है। अब स्टेडियम की चारदीवारी भी टूटने लगी है।
वर्ष 2008 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इसका निर्माण करवाया था। यहां के खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीते हैं। ओलंपिक तक में जिले का प्रतिनिधित्व हुआ है।
बुनियादी सुविधाओं का अभाव ः गांवों में खेल प्रतिभाओं को न अभ्यास के लिए उचित मैदान मिल रहा है और न प्रशिक्षक। ग्रामीण क्षेत्रों में बने राजीव गांधी खेल स्टेडियमों में भी खिलाड़ियों को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पा रहीं। पट्टी अफगान स्टेडियम में घास-फूस ने पूरा मैदान घेर रखा है। पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं है। ऐसे हालात में खिलाड़ी अभ्यास कैसे करें? करीब दस साल पहले बना यह स्टेडियम अब खंडहर जैसा नजर आता है। पहले जिला खेल कार्यालय भी यहीं था, लेकिन पांच साल पहले उसे इंडोर खेल स्टेडियम कैथल में शिफ्ट कर दिया गया। छह साल से विभाग ने इस स्टेडियम की अनदेखी की है।
घास-फूस और गंदगी से दिक्कत
इस समय स्टेडियम में घास-फूस उग आया है और मैदान का भवन जर्जर हो गया है। स्टेडियम बने करीब दस साल हो चुके हैं। जब इसे बनाया गया था, तब जिला खेल कार्यालय भी यहीं था, लेकिन पांच साल पहले विभाग ने कार्यालय इंडोर खेल स्टेडियम, कैथल में शिफ्ट कर लिया। विभाग ने श्री गुरु गोबिंद सिंह खेल स्टेडियम को छह साल पहले ही पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। -अरुण शर्मा, एथलीट, सीवन
अधिकारियों और कोचों की सुविधा है लेकिन 20 एकड़ में करोड़ों रुपये खर्च कर बना स्टेडियम खराब हालत में है। गेट के बाहर इतनी घास और गंदगी जमा है कि प्रवेश करना मुश्किल हो गया है। खेल मैदान में कई फीट लंबी कांग्रेस घास उगी हुई है, स्टेज के चारों तरफ कूड़ा और झाड़ियां फैली हैं, शौचालय बदहाल पड़े हैं, खेल का सामान टूटा पड़ा है, भवन की परतें उखड़ रही हैं और दर्शक दीर्घा की सीढ़ियों पर पीपल का पेड़ तक उग आया है। यही अब स्टेडियम की पहचान बन गई है। -सचिन, खिलाड़ी, सीवन
यह खेल स्टेडियम बनने के बाद भी खिलाड़ियों के किसी काम का नहीं रह गया। पूरे मैदान में घास उगी है और उसमें जहरीले कीड़े होने का डर बना रहता है। हम सुबह चार बजे दौड़ लगाने आते हैं। तब घना अंधेरा होता है। हमें मोबाइल की टॉर्च जलाकर दौड़ लगानी पड़ती है। हमने स्टेडियम में लाइट की व्यवस्था कराने की मांग की है। अफसरों को हमारी परेशानी समझनी चाहिए। -रोहित, खिलाड़ी