संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल/कलायत/राजौंद। मंगलवार को जिले भर में नागपंचमी का पर्व पारंपरिक श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। घरों के दरवाजों पर नाग देवता के चित्र बनाकर उनकी पूजा की गई। साथ ही भगवान शिव और शेषनाग का दूध, हल्दी व कुमकुम से अभिषेक कर उन्हें नैवेद्य अर्पित किया गया।
इस अवसर पर कई मंदिरों में भोलेनाथ का रुद्राभिषेक भी किया गया। पंडित विशाल शांडिल्य ने बताया कि श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागपंचमी पर्व मनाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। नाग पूजा सनातन परंपरा का अभिन्न हिस्सा है।
उन्होंने बताया कि शास्त्रों व पुराणों में शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, शंख, कालिया और धृतराष्ट्र आदि प्रमुख नागों का वर्णन मिलता है। देशभर में विभिन्न स्थानों पर नाग मंदिर स्थित हैं, जहां क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार नाग देवता की पूजा होती है।
पंडित शांडिल्य ने महाभारत काल की कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि राजा परीक्षित की तक्षक नाग द्वारा मृत्यु के बाद, उनके पुत्र जनमेजय ने सर्प यज्ञ कर नाग जाति के विनाश का संकल्प लिया था। तब आस्तिक मुनि ने यज्ञ को रुकवाकर नागों की रक्षा की थी। तभी से नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा की परंपरा प्रारंभ हुई।
उधर, राजौंद के दुर्गा मंदिर स्थित शिव मंदिर में मंगलवार को नाग पंचमी के पावन अवसर पर काल सर्प दोष की शांति के लिए विधिवत रुद्राभिषेक किया गया। पूजन कार्यक्रम आचार्य पंडित राम भगत हरित की अध्यक्षता में संपन्न हुआ, जिसमें विद्वान ब्राह्मणों ने मंत्रोच्चारण के साथ अभिषेक, नाग गायत्री मंत्र का जाप और हवन यज्ञ किया।
आचार्य राम भगत हरित ने बताया कि हर वर्ष सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर विशेष पूजन के माध्यम से काल सर्प दोष की शांति कराई जाती है। जिन जातकों की जन्म कुंडली में काल सर्प दोष होता है, उनके जीवन में अनेक प्रकार की बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। यह दोष बारह प्रकार का होता है, जिसकी शांति के लिए शास्त्रों में बताए अनुसार पूजा-अर्चना करना आवश्यक होता है। उन्होंने बताया कि सावन माह में प्रतिदिन जलाभिषेक करने का विशेष महत्व है और इस महीने भगवान शिव की आराधना से समस्त कष्टों का निवारण संभव है। इस अवसर पर राजेंद्र शर्मा, रवि श्याम कौशल, रामपाल पुजारी, रमेश कुमार सहित अनेक श्रद्धालु व ब्राह्मण उपस्थित रहे।