संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। मुस्कान सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल, ग्योंग की छात्रा मुस्कान ने अंडर-19 स्कूल राष्ट्रीय हैंडबॉल प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीतकर कैथल का नाम रोशन किया है। महज 16 वर्ष की उम्र में राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्धि हासिल कर मुस्कान आज जिले की बेटियों के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन गई हैं। शनिवार को कैथल-करनाल रोड पर खेल प्रेमियों ने मुस्कान का भव्य स्वागत किया।
मुस्कान के पिता सन्नी कुमार मेहनत-मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने कभी भी बेटी के सपनों को कमजोर नहीं पड़ने दिया। तीन बहनों और एक भाई के परिवार से ताल्लुक रखने वाली मुस्कान ने कठिन हालातों के बीच कड़ी मेहनत, अनुशासन और लगन के बल पर यह मुकाम हासिल किया है।
मुस्कान का कहना है कि उनके पिता बहुत मेहनत करते हैं और वह चाहती हैं कि उनकी वजह से उनके पिता को कभी किसी के सामने झुकना न पड़े। खेल के माध्यम से देश और माता-पिता का नाम रोशन करना ही उनका सपना है। मुस्कान ने बताया कि इस सफलता में उनके कोचों का बड़ा योगदान रहा है।
कोच रविंदर (चांट) और कोच राहुल (पोना) ने उसकी प्रतिभा को पहचानकर सही दिशा में मार्गदर्शन दिया।
दिनचर्या है कठिन पर...
मुस्कान की दिनचर्या किसी पेशेवर खिलाड़ी से कम नहीं है। वह रोजाना सुबह 5 से 7 बजे तक दो घंटे हैंडबॉल का अभ्यास करती है। इसके बाद स्कूल की पढ़ाई में जुट जाती है। शाम को फिर 4 से 7 बजे तक तीन घंटे कठिन अभ्यास करती है। इस तरह मुस्कान प्रतिदिन लगभग पांच घंटे अभ्यास करती है।
मुस्कान बेहद अनुशासित और जुझारू खिलाड़ी है। हालात चाहे जैसे भी रहे हों, उसने कभी अभ्यास से समझौता नहीं किया। यहां तक कि बुखार की स्थिति में भी वह अभ्यास के लिए मैदान में पहुंचती रही। एक सच्चे खिलाड़ी की पहचान यही होती है कि वह मुश्किल परिस्थितियों से डरता नहीं, बल्कि मेहनत और लगन से उन्हें पार करता है। -रविंदर, कोच
खेल प्रेमियों ने बिठाया पलकों पर, ढोल की थाप पर हुआ स्वागत
अंडर-19 स्कूल राष्ट्रीय हैंडबॉल प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीतने की खबर जैसे ही गांव और जिले में पहुंची, खुशी की लहर दौड़ गई। शनिवार को कैथल–करनाल रोड पर खेल प्रेमियों, ग्रामीणों और युवाओं ने ढोल-नगाड़ों के साथ मुस्कान का जोरदार स्वागत किया। लोगों ने फूल-मालाएं पहनाकर उसका हौसला बढ़ाया। कहा ै कि मुस्कान जैसी खिलाड़ी यह साबित करती हैं कि प्रतिभा किसी संसाधन की मोहताज नहीं होती। हौसले मजबूत हों, तो कोई बच्चा भी राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत सकता है।