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Kaithal News: अवशेष प्रबंधन व जहर मुक्त खेती के लिए महेंद्र राणा हुए सम्मानित

Tue, 18 Mar 2025 01:36 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
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संवाद न्यूज एजेंसी
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कलायत/कैथल। चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय में चल रहे दो दिवसीय वार्षिक कृषि मेले में हर जिले से दो प्रगतिशील किसानों को सम्मानित किया गया। इनमें फसल अवशेष प्रबंधन व प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में उपलब्धि हासिल करने पर बात्ता के किसान महेंद्र नंबरदार और जसवंती की प्रगतिशील किसान नीलम को सम्मानित किया गया समारोह में बतौर मुख्य अतिथि जर्मनी फ्रेंकफर्ट के सांसद राहुल कुमार के साथ उपकुलपति डाॅ. बीआर कांबोज ने दोनों को प्रशस्ति पत्र दिया।

कार्यक्रम के दौरान महेंद्र नंबरदार ने कहा कि इस तरह से सम्मानित होने पर वे स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जहर मुक्त खेती उनका सपना था जो इस समय पूरे यौवन पर है। पिछले दस वर्षों से वे पूरी तरह से प्राकृतिक खेती कर भरपूर पैदावार ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती आधुनिक रासायनिक जहर युक्त खेती के दुष्प्रभावों का एक संभव समाधान है। इस तरह की खेती में रसायनों का प्रयोग किए बिना सफल एवं सतत तरीके से किसान जहर मुक्त खेती कर सकता है। इस तरह की खेती में उत्पादन लागत बहुत ही कम या शून्य के बराबर आती है, जिससे किसान अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकता है।
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इसके साथ ही समाज के अन्नदाता के रूप में स्वस्थ भोज्य पदार्थ उपलव्ध करवा कर स्वस्थ भारत- समृद्ध परिवेश के सपने को भी साकार करने में अपनी भूमिका अदा कर सकता है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों अविवेकपूर्ण एवं अन्धाधुंध प्रयोग किया जा रहा है उसके अनेक दुष्परिणाम देखने को मिल रहे हैं। रासायनिक कृषि से जल, वायु, मृदा और यहां तक की विभिन्न खाद्य पदार्थ भी दूषित हो रहे हैं। इससे मृदा की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है। जबकि प्राकृतिक खेती एक परंपरागत रसायन मुक्त खेती है।

यह खेती प्रकृति में प्राकृतिक तरीके से उपलब्ध चीजों का उपयोग करके की जाती है। भारत में प्राकृतिक खेती पद्मश्री सुभाष पालेकर ने शुरू की गई थी, जिनकी प्रेरणा से वे खेती में रासायनिक खादों का प्रयोग किये बिना शून्य लागत खेती कर रहे हैं। प्राकृतिक खेती के लाभ बताते हुए किसान ने कहा कि इस तरह की खेती में किसी भी तरह के रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक इस्तेमाल नहीं किए जाते हैं। केवल प्राकृतिक तरीके से उपलब्ध चीजों का उपयोग करके ही यह कृषि की जाती है। जिससे किसान की बाजार पर निर्भरता को कम करता है।
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खाद्य पदार्थों में उचित मात्रा में पोषक तत्व होने से उनकी गुणवत्ता बढ़ जाती है। गांव में पहुंचने पर किसान महेंद्र नंबरदार का भव्य स्वागत किया गया। नंबरदार ने अपनी सफलता का श्रेय कृषि विज्ञान केंद्र कैथल के मुख्य समन्वयक डाॅ. रमेश चंद्र वर्मा को दिया। उन्होंने कहा कि डॉ. वर्मा के मार्गदर्शन में उन्होंने यह सफलता हासिल की है।
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