संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। बचपन की यादों में पतंगबाजी का उत्साह हमेशा एक खास स्थान रखता है। कैथल के मोहल्लों में बच्चों और युवाओं के लिए पतंगबाजी केवल एक खेल नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-जोल और परंपरा का अहम हिस्सा रही है। खुले आसमान के नीचे रंग-बिरंगी पतंगें उड़ाना और “काटी-काटी” की आवाजें आज भी लोगों को बचपन की ओर ले जाती हैं।
गौरव ने बताया कि इस खेल का असली मजा पतंग काटने और कटी हुई पतंग की डोर पकड़ने में होता था। उन्होंने कहा कि हम पतंग उड़ाते थे और जैसे ही किसी की पतंग कटती, उसकी दौड़ लग जाती थी। यह दौड़ इस बात की परीक्षा होती थी कि कौन सबसे पहले डोर पकड़ कर पतंग हासिल करता है। मोहल्लों में यह प्रतिस्पर्धा बेहद रोमांचक होती थी और हर कोई तैयारी के साथ शामिल होता था।
वहीं दीपक ने बताया कि पतंगबाजी का उत्साह कई दिन पहले से ही शुरू हो जाता था। उन्होंने कहा कि मोहल्ला स्तर पर छोटी-छोटी नोकझोंक और वार-पेंच के साथ खेल की तैयारी होती थी। हर टीम अपनी रणनीति बनाती और हवा की दिशा, पतंग की लंबाई और डोर की मजबूती पर ध्यान दिया जाता था। यह खेल केवल कौशल का नहीं, बल्कि धैर्य और तेज प्रतिक्रिया की भी परीक्षा था।
चक्कुलदाना निवासी सुनील ने बताया कि पहले त्योहारों पर छतें रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाती थीं। जबरदस्त उत्साह रहता था। पतंग काटने की बाकायदा चुनौती दी जाती थी और जैसे ही किसी की पतंग कटती, बच्चे उसे पकड़ने के लिए गलियों में दौड़ लगा देते थे। अमन ने बताया कि पहले गांवों में अलग-अलग टीमें बनाकर पतंगबाजी होती थी। हर टीम अपनी पतंग और मांझे को सबसे मजबूत साबित करने की कोशिश करती थी। टीम भावना और आपसी प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ भाईचारा भी देखने को मिलता था। बड़े-बुजुर्ग भी बच्चों का उत्साह बढ़ाते थे और छतों पर बैठकर हौसला अफजाई करते थे।