हालांकि यह उत्सव केवल खेल ही नहीं, बल्कि मोहल्ले और समुदाय के बीच सामूहिक उत्साह और जोश का प्रतीक माना जाता था। समय के साथ त्योहारों और उत्सवों का स्वरूप बदलना आम बात है। पुराने उत्साह की जगह नई पीढ़ी ने उसे खेल और मनोरंजन के रूप में अपनाया है। बावजूद इसके, पतंगबाजी ने हमेशा लोगों को जोड़ने, खुशियाँ बाँटने और हमारी सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने का काम किया है। भले ही उत्सव की शैली बदल गई हो, लेकिन उत्सव की खुशियाँ, सामाजिक मेलजोल और उत्साह आज भी युवाओं और पुरानी पीढ़ी में समान रूप से दिखाई देते हैं।
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स्थानीय निवासी आकाश ने बताया कि पहले तो उत्सव की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती थी। पतंगों और डोर की खरीदारी, रणनीति बनाना और सजावट करना पूरे मोहल्ले में उत्साह का माहौल पैदा कर देता था। हर कोई इस दिन को लेकर बेहद उत्साहित रहता था और छोटे-बड़े सभी इसमें बढ़-चढ़कर भाग लेते थे।
नरेश ने कहा कि आज के समय में यह उत्सव भले ही अपनी पारंपरिक प्रतियोगिता वाली परंपरा को खो रहा हो, लेकिन इसकी मौज-मस्ती और सामुदायिक भावना अब भी बरकरार है। अब पतंगबाजी महज मनोरंजन और खेल का माध्यम बन गई है। लोग इसे आनंद लेने और सामाजिक मिलन का अवसर मानते हैं। कटे हुए पतंगों को इकट्ठा करना उतना रोमांचक नहीं रहा, लेकिन उत्सव का महत्व अब भी लोगों के लिए खास बना हुआ है।
नरेश