राजनीतिक क्षेत्र के जानकार मानते है कि इस बार पूंडरी की सीट पार्टी के खाते में जा सकती है और निर्दलीय की परंपरा टूट सकती है। इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि पिछले छह चुनाव से लगातार यहां निर्दलीय विधायकों के कारण विकास की गति सुस्त पड़ चुकी है। बावजूद पार्टी के विधायक की कमी समय-समय पर खलती रही है। इसके अलावा हलके में कोई बड़ा उद्योग या बड़ी परियोजना भी लागू नहीं हो पाई है। यहां तक कि पूंडरी को सब-डिवीजन बनवाने का मुद्दा जो कि पिछले कई प्लान से उठता रहा है, वो इस बार भी अधूरा रह गया है।
1966 में कंवर रामपाल ने कांग्रेस ने चौधरी ईश्वर सिंह को हराया। 1968 में स्व. ईश्वर सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी तारा सिंह को हराकर पूंडरी में निर्दलीय की नींव रखी। 1972 में कांग्रेस टिकट पर ईश्वर सिंह ने हरचरण को हराया। 1977 स्वामी अग्निवेश जनता पार्टी ने कांग्रेस के अनंतराम को हराया। 1982 में कांग्रेस के ईश्वर सिंह ने लोकदल के भाग सिंह को हराया। 1987 में लोकदल के मक्खन सिंह ने कांग्रेस के ईश्वर सिंह को हराया। 1991 में कांग्रेस के ईश्वर सिंह ने मक्खन सिंह को हराया।
1996 में पूर्व मंत्री नरेंद्र शर्मा ने जब कांग्रेस उम्मीदवार स्व. ईश्वर सिंह को हराया तो उसके बाद पूंडरी में फिर किसी पार्टी का विधायक नहीं बन पाया और पूंडरी को निर्दलीय का गढ़ कहा जाने लगा। 2000 में तेजवीर सिंह निर्दलीय ने निर्दलीय नरेंद्र शर्मा को हराया। 2005 में कौशिक ने इनेलो के नरेंद्र शर्मा को हराया, 2009 में सुलतान ने कांग्रेस के दिनेश कौशिक को हराया। 2014 में कौशिक निर्दलीय ने भाजपा के रणधीर गोलन को हराया। इसी प्रकार पिछले 2019 के चुनाव में निर्दलीय रणधीर सिंह गोलन ने कांग्रेस के सतबीर भाणा को हराया था।