संवाद न्यूज एजेंसी
सीवन। कृष्ण कृपा सेवा मंदिर में बुधवार को गीता मनीषी व महामंडलेश्वर स्वामी ज्ञानानंद महाराज के अचानक आगमन से भक्तों में हर्ष की लहर दौड़ गई। इस अवसर पर स्वामी जी ने उपस्थित अनुयायियों को जीवन में संतुलन, प्रेम और सद्भाव के साथ जीने का प्रेरणादायक संदेश दिया।
स्वामी ज्ञानानंद का मंदिर पहुंचने पर श्रीकृष्ण कृपा सेवा समिति के प्रधान संजय आहूजा शंटी, पूर्व प्रधान सुरेश सरदाना राजू एवं अन्य समिति सदस्यों ने पुष्प वर्षा कर भव्य स्वागत किया।
अपने प्रवचनों में स्वामी ज्ञानानंद महाराज ने कहा कि आज के दौर में यदि जीवन को सुंदर और सार्थक बनाना है, तो उसमें संतुलित आहार, प्रेमपूर्ण व्यवहार, और आपसी सद्भाव अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि भौतिक उपलब्धियों के पीछे भागने की बजाय हमें आत्मिक शांति और संतुलित जीवन की ओर अग्रसर होना चाहिए।
स्वामी जी ने कहा, कि आपसी मतभेदों को प्रेम और संवाद से सुलझाएं, और जीवन को आध्यात्मिकता से जोड़ें। जब व्यवहार में प्रेम और करुणा हो, तो समाज में स्वतः शांति और समरसता फैलती है।
उन्होंने कहा कि दिल की स्थिरता ही सच्चे सुख की चाबी है, और यह स्थिरता सत्संग, सेवा और साधना से ही प्राप्त होती है। क्रोध, लोभ और ईर्ष्या जैसे विकारों से बचकर, परोपकार के मार्ग पर चलना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि अहंकार का त्याग कर विनम्रता अपनाने से ही आत्म-विकास संभव है। छोटी-छोटी बातों पर मन को विचलित न करते हुए, हर क्षण प्रभु भक्ति में लगाना चाहिए।
कार्यक्रम का समापन आरती के साथ हुआ, जिसके उपरांत प्रसाद वितरण किया गया। इस विशेष अवसर पर समिति के प्रधान संजय आहूजा शंटी, पूर्व प्रधान सुरेश सरदाना, भाजपा जिला उपाध्यक्ष शैली मुंजाल, पार्षद मोंटी कामरा, अधिवक्ता गौरव वधवा, राजीव मिड्ढा, केवल कृष्ण मिड्ढा, कृष्ण वधवा, सुरेश वधवा, समीर नागपाल, राजेंद्र कामरा, कार्तिक सरदाना, चिराग सरदाना, दीपिका सरदाना सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
युवाओं से किया सकारात्मक दिशा में ऊर्जा लगाने का आह्वान
स्वामी जी ने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी ऊर्जा को सत्संग, सेवा और साधना में लगाकर जीवन को सार्थक बनाएं। उन्होंने कहा कि ईश्वर को जीवन का केंद्र बनाने से मनुष्य का मार्ग अपने आप स्पष्ट हो जाता है। स्वामी ज्ञानानंद ने श्रीमद् भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि निष्काम कर्म ही मानव धर्म है। उन्होंने कहा कि जब हृदय प्रभु चरणों में लग जाता है, तब संसार का कोई भी दुख शेष नहीं रहता। उन्होंने जीवन को दीपक के समान बताया, जो स्वयं जलकर समाज को प्रकाश देता है।