कैथल। शासन-प्रशासन की ओर से 48 घंटे में फसल भुगतान के बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन हालात ये हैं कि किसान अपनी फसल बेचने के बाद भी मोबाइल में बैंक के संदेश का इंतजार कर रहे हैं। उनकी फसल का भुगतान नहीं हो पा रहा है। इसके पीछे उठान की कछुआ चाल है। किसानों का 900 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान अटका हुआ है। नियमों के मुताबिक, जब तक मंडी से फसल का उठान होकर वह गोदाम तक नहीं पहुंचती, तब तक भुगतान की प्रक्रिया पूरी नहीं होती। उठान की सुस्त रफ्तार ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। हालांकि पिछले 24 घंटे में खरीद की प्रक्रिया ने गति पकड़ी है। अब मंडियों में 76 हजार एमटी के लगभग ही बिना बिके पड़ा है, जो कि दो दिन पहले लाखों एमटी में था।
भारी आवक और सुस्त उठान
मंडियों में फसलों की आवक और उठान के आंकड़े चिंताजनक हैं। अब तक मंडियों में लगभग 6.76 लाख मीट्रिक टन फसल की आवक हो चुकी है, जिसमें से सरकारी एजेंसियों ने 6 लाख मीट्रिक टन की खरीद भी कर ली है, लेकिन समस्या उठान के स्तर पर है। खरीदी गई फसल में से केवल 2.55 लाख मीट्रिक टन का ही उठान हो पाया है। यानी खरीदी गई आधी से ज्यादा फसल अभी भी मंडियों में खुले आसमान के नीचे पड़ी है। मंडियों के हालात बदतर हो गए हैं। अनाज की बोरियों के ढेर लगने से मंडियां पूरी तरह अट गई हैं, जिससे नई फसल लेकर आ रहे किसानों को ट्रॉली खड़ी करने तक की जगह नहीं मिल रही। इस जाम की मुख्य वजह ट्रांसपोर्टेशन की कमी है। मंडियों में उठान के लिए गाड़ियों की संख्या जरूरत के मुकाबले बेहद कम पड़ रही है।
किसानों के पास पैसे की किल्लत
किसानों में क्योड़क के रणधीर, महेंद्र और मनोज का कहना है कि भुगतान न मिलने से अगली फसल की तैयारी और घरेलू जरूरतों के लिए पैसे की किल्लत हो गई है। आगे जमीन भी ठेके पर लेनी है और अन्य कृषि खर्च हैं। किसानों का कहना है कि 48 घंटे में भुगतान का सरकारी दावा पूरी तरह हवा हवाई साबित हो रहा है। यदि जल्द ही उठान में तेजी नहीं लाई गई, तो मंडियों में अव्यवस्था और अधिक बढ़ सकती है।