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Kaithal News: सर्वोत्तम फल देने वाली है देव उठनी एकादशी ः पं. शास्त्री

Tue, 12 Nov 2024 01:30 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
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संवाद न्यूज एजेंसी
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पूंडरी। कार्तिक मास की देव उठनी एकादशी को तुलसी विवाह के रूप में मनाने की प्रथा है। कार्तिक माह की शुक्ल एकादशी को भगवान चार महीने की निद्रा के बाद जागते हैं। भगवान के जागने के साथ ही मांगलिक कार्यों की शुरुआत भी हो जाती है। यह जानकारी पंडित रविदत्त शास्त्री ने दी।

देवउठनी एकादशी के महत्व के बारे में बताते हुए उन्होंने बताया कि इस दिन भगवान विष्णु की विधि विधान के साथ पूजा की जाती है, इसके अलावा माता तुलसी का शालीग्राम के साथ विवाह भी किया जाता है। मान्यता के अनुसार, राक्षस कुल में एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम वृंदा रखा गया था।
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बचपन से भगवान विष्णु की परम भक्त वृंदा हमेशा उनकी भक्ति में लीन रहती थी। जब वृंदा विवाह योग्य हुई तो उसके माता-पिता ने उसका विवाह समुद्र मंथन से उत्पन्न हुए जलंधर के साथ कर दिया। वृंदा भगवान विष्णु के भक्त के साथ एक पतिव्रता स्त्री थी, जिसके कारण उसका पति जालंधर और भी शक्तिशाली हो गया। जालंधर जब भी युद्ध पर जाता वृंदा पूजा अनुष्ठान करती। वृंदा की भक्ति के कारण जालंधर को कोई भी नहीं मार पा रहा था, जालंधर ने देवताओं पर चढ़ाई कर दी, सारे देवता जालंधर को मारने में असमर्थ हो रहे थे।

जालंधर उन्हें बुरी तरह से हरा रहा था। दुखी होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और जालंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे तब भगवान विष्णु ने अपनी माया से जालंधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया। इसे जालंधर की शक्ति क्षीण हो गई और वो युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर का बन जाने का शाप दे दिया।
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भगवान को पत्थर का होता देख सभी देवी देवताओं में हाहाकार मच गया। फिर माता लक्ष्मी ने वृंदा से प्रार्थना की तब वृंदा ने जगत कल्याण के लिए अपना श्राप वापस ले लिया और खुद जालंधर के साथ सती हो गई तब उनकी राख से पौधा निकला जिसे भगवान विष्णु ने तुलसी नाम दिया और खुद को पत्थर में समाहित करते हुए कहा कि आज से तुलसी के बिना मैं प्रसाद स्वीकार नहीं करूंगा, इस पत्थर को शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जाएगा।
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