कैथल। बदलते मौसम के कारण सांस के रोगियों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। प्रदूषण का असर बीमारी को और बढ़ा दे रहा है। जिला नागरिक अस्पताल में औसतन 30 व इमरजेंसी में औसतन 20 रोगी इलाज के लिए रोजाना आ रहे है। इस बार इन्फ्लूएंजा एच3एन2 का वैरियंट का असर फीवर के मरीजों में दिख रहा है। जिसमें गले की खराश रहती है।
अस्पताल में रोजाना करीब 65 मरीज इसके आते है। डॉ. राकेश वर्मा ने बताया कि मेडिसिन की ओपीडी में रोजाना 250 से 300 मरीज आते है। उन्होंने बताया कि इसमें सांस की बीमारी के करीब दस प्रतिशत मरीज रहते है। मौसम में परिवर्तन के कारण पुराने के साथ नये सांस के रोगी भी बड़ी संख्या में आ रहे है। जिन्हें नियमित उपचार की जरूरत रहती है। उन्होंने बताया कि 25 से 30 प्रतिशत मरीजों में एच3एन2 के वैरियंट का असर दिखाई पड़ रहा है। सामान्यता वायरल फीवर एक हफ्ते में ठीक हो जाता है।
उन्होंने बताया कि एच3एन2 का वैरियंट का असर काफी समय तक रहता है। इस वैरियंट के कारण फीवर, गले में खराश व शरीर में दर्द रहता है। नार्मल कंडीशन में भाप लेने व वार्म गागलिंग करने से इसमें आराम मिलता है। ज्यादा कंडीशन खराब होने पर इसमें एंटी वायरल मेडिसिन देनी पड़ती है। वैरियंट का प्रभाव बढ़ने पर मरीज को भर्ती करके आक्सीजन देने समेत अन्य उपचार किया जाता है। उन्होंने बताया कि जिला अस्पताल की इमरजेंसी में इलाज के लिए रोजाना करीब 20 मरीज आते है। इसमें ज्यादातर गंभीर रहते है। प्राथमिक उपचार के बाद आधे मरीजों को भेज दिया जाता है। लेकिन 10 मरीजों को भर्ती करके उनका इलाज करना पड़ता है। इसके अलावा अस्पताल में ओपीडी में भी सांस के रोगी परामर्श लेने के लिए आते रहते है। कमजोर इम्यूनिटी वाले करे मास्क का प्रयोग - सांस के रोगियों के लिए प्रदूषण काफी असर डालता है। धुएं व धूल में जाने पर सांस की बीमारी और बढ़ जाती है। सांस की बीमारी वाले मरीजों को मास्क का प्रयोग करने की सलाह चिकित्सक दे रहे है।