रवाना। होली और फाग का त्योहार गांव-देहात में उत्साहा के साथ मनाया जाता था। ढोलक की थाप, चंग की गूंज और फाग के पारंपरिक गीतों के बीच लोग गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे को गले लगाते थे। समय के साथ होली का स्वरूप बदल गया है।
पहले फाग खेलने का अंदाज बिल्कुल अलग होता था। गांव की चौपाल पर बुजुर्ग बैठते, महिलाएं समूह में फाग गातीं और युवा घर-घर जाकर रंग लगाते। उस समय रंगों से ज्यादा महत्व रिश्तों का होता था। लोग सुबह से ही एक-दूसरे के घर पहुंचते, रंग-गुलाल लगाकर आशीर्वाद लेते और मिठाई खिलाते। फाग केवल रंगों का नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, भाईचारे और सामाजिक एकता का प्रतीक था।
गांव के कई बुजुर्ग धर्मेंद्र कहते हैं, पहले होली पर दिलों के दरवाजे खुलते थे। कोई छोटा-बड़ा नहीं होता था, हर कोई एक-दूसरे को सम्मान के साथ रंग लगाता था। वहीं विजेंद्र सिंह का कहना है, उस समय फाग खेलने में मर्यादा और अपनापन होता था। लोग हंसी-मजाक जरूर करते थे लेकिन उसमें गरिमा बनी रहती थी।
राममेहर बताते हैं कि पहले होली के दिन पुराने झगड़े खत्म करने की परंपरा थी। जिससे मनमुटाव होता था उसे भी रंग लगाकर गले लगा लेते थे। होली सच्चे मायनों में मेल-मिलाप का त्योहार थी।
संतरों और रामकली भी पुरानी यादों को साझा करते हुए कहती हैं कि महिलाएं पूरे उत्साह से फाग गाती थीं और घरों में पकवान बनाकर सबको खिलाया जाता था। तब होली रिश्तों को मजबूत करने का जरिया थी लेकिन आज का दृश्य कुछ बदला हुआ दिखाई देता है। तेज डीजे, केमिकल रंग और दिखावे की होली ने परंपरागत फाग की जगह ले ली है।
धर्मेंद्र का कहना है, अब त्योहार में वह अपनापन कम दिखता है, ज्यादा जोर प्रदर्शन और मस्ती पर होता है। विजेंद्र सिंह भी मानते हैं कि आज रंग तो हैं लेकिन पहले जैसी भावना नहीं रही। बुजुर्गों का मानना है कि त्योहार का असली उद्देश्य रिश्तों को जोड़ना था, न कि केवल रंग लगाना। पहले होली पर लोग मन से जुड़ते थे। आज कई जगह औपचारिकता ज्यादा नजर आती है। समय के साथ फाग का स्वरूप बदल गया है।
हालांकि रंग आज भी वही हैं लेकिन रिश्तों की गर्माहट में कमी महसूस की जा रही है। जरूरत इस बात की है कि हम फिर से होली को केवल रंगों का नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और भाईचारे का त्योहार बनाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उस सच्ची फाग की मिठास को महसूस कर सकें।
वर्जन
अब तो उम्र 70 की हो गई। ज्यादा चलने फिरने में सक्षम नहीं हूं लेकिन हमारे समय में जब हम फाग खेलते थे तब बात ही कुछ और होती थी। घर पर देवर आते गुलाल लगाते और पानी डालते थे जिसके बाद हल्के कपड़े से बने कोड़ों से पिटाई करते थे लेकिन आज देखती हूं कि उन हल्के कपड़ों की जगह आज रस्सी, प्लास्टिक की तारों ने ले ली जैसे कोई सजा देनी है। मैं तो सबसे यही कहूंगी कि सब मिल जुलकर प्यार से त्यौहार को त्योहार की तरह मनाओ।
–चंद्रो देवी, बुजुर्ग महिला, डूमरखां।